शोले भारतीय सिनेजगत की एक अमर फ़िल्म है और उसमें महान चरित्र अभिनेत्री लीला मिश्रा द्वारा निभाया गया बसंती की मौसी का किरदार एक अविस्मरणीय किरदार बन गया है।
उत्तर प्रदेश की रहने वाली लीला मिश्रा का फिल्मों में आना भी एक अद्भुत कहानी है। उनकी 12 वर्ष की उम्र में शादी हो गई थी। उनके पति राम प्रसाद मिश्रा फिल्मों में काम करते थे। वे उनके साथ बॉम्बे रहने आ गईं। बॉम्बे में दादा साहेब फाल्के की कंपनी 'नासिक सिने टोन' के मामा शिंदे की नजर उन पर पड़ी। उस समय फिल्मों में महिलाओं का काम करना अच्छा नहीं माना जाता था अतः हीरोइन मिलती नही थीं। मामा शिंदे ने लीला मिश्रा से फिल्मों में काम करने की सहमति ले ली और मिश्रा दंपति को फ़िल्म 'सती सुलोचना' के लिए लीला मिश्रा जी को 500 रुपये और उनके पति को 150 रुपये प्रति माह की तनख्वाह पर अनुबंधित कर लिया। इसमे उनके पति को रावण और उन्हें मंदोदरी का रोल अदा करना था। पर जैसे ही मेकअप मैन ने उनके गाल पर हाथ लगाया लीला मिश्रा जी भड़क गईं उन्होंने कहा कि एक पराया मर्द कैसे मेरे शरीर को हाथ लगा सकता है। इस कारण से उन्होंने उस फिल्म में काम नही किया।
इसके बाद उन्हें सन 1935 में बनी फ़िल्म "भिखारिन" में हीरोइन का रोल दिया गया। इसमे भी उन्होंने कहा कि मैं पराए मर्द की कमर में हाथ नहीं डालूँगी। अंततः इस फ़िल्म में भी उन्होंने काम नहीं किया।
फ़िल्म 'गंगावतरण' में उन्होंने पार्वती का रोल निभाया। इसके बाद 'होनहार' में फिर नायिका का रोल दिया गया पर इसमें भी उन्होंने भारतीय नारी की मर्यादा को ध्यान रखते हुए हीरो के साथ रोमांटिक दृश्य करने से मना कर दिया। अंततः उन्हें इस फ़िल्म में माँ का रोल दिया गया। जिससे उन्होंने बखूबी निभाया और उसके बाद उन्होंने लगभग हर फिल्म में माँ, चाची और मौसी का ही किरदार अदा किया।
वे भारतीय महिला की मर्यादा का बहुत ध्यान रखती थीं। उन्होंने अपनी हर फिल्म में अपने सिर को पल्लू से ढक कर रखा था।
200 से अधिक फ़िल्मों में काम करने वाली लीला मिश्रा फिल्में नही देखती थी। उनका कहना था:-
"फ़िल्म देखने मे पैसा बर्बाद करने से तो अच्छा है कि उस पैसे को अच्छे खाने और अच्छे साहित्य जैसे रामायण आदि पर खर्च किया जाए।"
- विजय सोहनी
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