बुरहानपुर - पहाड़ी नदी उतावली की कल-कल बहती तेज धारा और पूर्णिमा की चांदनी रात का नजारा। चांदी सी सफेद रोशनी में नदी के तट पर गीत-संगीत की महफिल के सुकूनभरे पल।
ये यादगार क्षण करीब 400 साल पहले बुरहानपुर में अकसर जीवंत हुआ करते थे। जिला मुख्यालय से करीब 21 किमी दूर ग्राम महल गुलारा में उतावली नदी के बांध के पास बने विशेष महल में सजने वाली गीत-संगीत की महफिल कभी मुगल साम्राज्य की शानो-शौकत का एक हिस्सा रही है।
इतिहासकार मो. नौशाद एवं डॉ. (मेजर) एमके गुप्ता ने बताया कि वर्ष 1615 में अब्दुल रहीम खान-ए-खाना ने मुगल बादशाह जहांगीर के आदेश पर जैनाबाद आहूखाना में पानी की व्यवस्था के लिए करारा गांव में छोटी उतावली नदी पर बांध का निर्माण करवाया था।
बुरहानपुर के कुंडी भंडारा से 100 कुंडियों के माध्यम से जिस तरह पानी शहर में लाया गया था, उसी तरह करारा गांव से आहूखाना तक इस बांध से कुंडियों के माध्यम से पानी पहुंचाया गया। इसका मुख्य जलस्रोत करारा गांव का बांध था।
जब शाहजहां अपने पिता के साथ बुरहानपुर आए और इस स्थान पर शिकार के लिए पहुंचे तो उनको वहां की खूबसूरती बहुत पसंद आई। पिता की मृत्यु के बाद जब शाहजहां तख्त पर बैठे और बुरहानपुर आए तो उनके स्वागत में इस स्थान पर मुजरे की एक महफिल सजाई गई।
इस दौरान गुलआरा नाम की एक तवायफ शाहजहां को पसंद आ गई। उन्होंने उसके नाम से यहां पर नदी के दोनों किनारों पर दो खूबसूरत महल बनवाए और इनके नाम बेगम गुलआरा के नाम पर रखे गए।
करारा गांव का नाम भी बदलकर महल गुलारा कर दिया गया। दोनों महलों को बांध से इस तरह मिलाकर बनाया गया कि बांध की खूबसूरती में भी चार चांद लग गए।
महल का निर्माण ईंट और चूने से किया गया था। दो मंजिला महल और ऊपर जाने के लिए सीढ़ियां भी बनवाई गई थीं। ऊपर खूबसूरत गुंबद बनवाए गए। दोनों महल लगभग 50 गुना 50 वर्ग फीट में बने हैं।
बांध की लंबाई करीब 120 फीट और ऊंचाई 30 फीट तथा चौड़ाई 8.3 फीट है। कहा जाता है कि जब चांद पूरे शबाब पर होता है तो यहां का मंजर कुछ और ही होता है।
ऐसा भी कहा जाता है कि पूर्णिमा पर अकसर रात बिताने और इस स्थान का आनंद लेने के लिए लोग यहां आते थे। पहले यहां खूबसूरत बगीचे भी थे लेकिन अब पुरातत्व विभाग के पास बांध और महल को संरक्षित करने की कोई योजना नहीं है। महल मरम्मत और रखरखाव का इंतजार कर रहे हैं।