बुरहानपुर - ऐसा माना जाता है की छत्रपति राजाराम पेशवा की विधवा ताराबाई साहेब पेशवन ने सन् 1710 मे अपनी बहादुरी से मुगल बादशाह बहादुर शाह प्रथम जिन्हें शाह आलम के नाम से भी जाना जाता है, को 6 सूबों की चौथ और सरदेशमुखी का फरमान मराठो के हक में जारी करना पड़ा और इस प्रकार मुगल सत्ता में मराठों का वर्चस्व शुरू हो गया।
धीरे धीरे खानदेश और बुरहानपुर सूरत मार्ग की चौथ और सरदेशमुखी वसुली भी मराठे करने लगे।
विरांगना ताराबाई साहेब की बहादुरी के किस्से दूर-दूर तक मशहूर हो गए।
सन 1740 के आसपास सुबे का क़ार्य सुचारू चलाने के लिए भवन की आवश्यकता की पूर्ती हेतू इस हवेली का निर्माण हुआ और यह "सुबा हाउस" "बाई साहेब की हवेली"(A tribute to Tarabai saheb) के रूप में विख्यात होकर कार्य करने लगा।
बतौर कलेक्टर "श्री राव बहादुर बाबा साहब फरासखाने वाले" जो महाराष्ट्रीयन ब्राम्हण कुल के थे ने कार्यभार संभाला।
यह हवेली सन 1970 तक अपनी सुन्दर, उत्कृष्ट, अद्भुत काष्ठ कला के लिए प्रसिध्द थी। अब केवल यादें शेष हैं।
यह चित्र सन् 1840 में सी. डिबडेन और केप्टन मेड़ोज टेलर ने चित्रीत किया व ए. फुलरटन एण्ड कं. लंदन ने प्रकाशित किया।