स्वातंत्र्य वीर सावरकर फिल्म देखे और दिखाए-अर्चना चिटनिस

बुरहानपुर। 22 मार्च 2024 को रिलीज हुई स्वातंत्र्य वीर सावरकर फिल्म देश भर में खूब लोकप्रियता हासिल कर रही है। फिल्म देखने के बाद भाजपा प्रदेश प्रवक्ता एवं विधायक श्रीमती अर्चना चिटनिस ने कहा कि क्रांतिकारी वीर सावरकर उनके जीवन के रोल मॉडल रहे हैं। जब देश में जातिवाद का जहर घोला जा रहा था। उस समय वीर सावरकर ने गांधीजी के समक्ष अखण्ड भारत की पैरवी की थी। सावरकरजी ने ही जाति के नाम पर देश के विभाजन को रोकने के लिए लड़ाई लड़ी थी। इस फिल्म के जरिए नई पीढ़ी को यह जानने को मिलेगा कि वीर सावरकर जैसे महान क्रांतिकारी सदियों में भी पैदा होते हैं। इस प्रकार की फिल्में बनाना देश सेवा है और देखना राष्ट्रीय कर्तव्य। यह फिल्म न केवल हमें हमारे रोम-रोम को देशभक्ति से झंकृत करती बल्कि आजादी के अमृतकाल में हमें अपनी बेहतर भूमिका निभाने की प्रेरणा भी देती है।
श्रीमती चिटनिस ने सभी से करबद्ध आग्रह है किया कि ‘‘स्वातंत्र्य वीर सावरकर‘‘ देखे, अपने इष्ट मित्रों को दिखाए, परिवार के साथ देखे। ऐसी फिल्में हमें इतिहास की उन पृष्ठों की भी जानकारी देती है जो जानकारी हमें कभी मिली ही नहीं। हुतात्मा चापेकर बंधुओं को जिस रात फांसी हुई उसी रात 14 वर्षीय सावरकर ने अपने आपको स्वतंत्रता संग्राम के लिए तैयार कर लिया। एक देशभक्त, क्रांतिकारी, महान चिंतक सावरकर में उसी रात अपने अंदर स्वतंत्रता की लौह प्रतिज्ञा, दृढ़ संकल्प की ज्वाला को प्रज्वलित कर लिया था। यह ठीक ही कहा गया है ‘‘है अमर शहीदों की पूजा हर एक राष्ट्र की परंपरा, उनसे है मां की कोख धन्य, उनको पाकर है धन्य धरा। गिरता है उनका रक्त जहां, वे ठौर तीर्थ कहलाते हैं, वे रक्त-बीज अपने जैसों की नई फसल दे जाते है‘‘।
विधायक श्रीमती चिटनिस ने कहा कि वीर सावरकर पहले क्रांतिकारी थे जो समुद्री जहाज में बंदी बनाकर ब्रिटेन से भारत लाते समय आठ जुलाई 1910 को समुद्र में कूद पड़े थे और 80 मील तैरकर फ्रांस पहुँच गए थे। इस ‘अमर छलांग‘ को मध्यप्रदेश के स्कूल शिक्षा विभाग ने स्मरणीय बनाने हेतु प्रतिवर्ष 102 विद्यार्थियों का चयन कर इन बच्चों को उनके यातना स्थल सेलुलर जेल तक ले जाकर स्वतंत्रता हेतु क्रांतिकारियों की यादों को अजर अमर बनाने का प्रयास किया।
पूर्व मंत्री श्रीमती अर्चना चिटनिस ने कहा कि वीर सावरकर पहले ऐसे भारतीय थे जिन्होंने अंग्रेजों द्वारा 1857 का गदर कहे जाने वाले संघर्ष को ‘1857 का स्वातंर्त्य समर’ नामक ग्रन्थ लिखकर इसे स्वतंत्रता संग्राम का संघर्ष सिद्ध कर दिया था। वीर सावरकर पहले देशभक्त थे जिन्होंने एडवर्ड सप्तम के राज्याभिषेक समारोह का उत्सव मनाने वालों को र्त्यम्बकेश्वर में बड़े बड़े पोस्टर लगाकर कहा था कि गुलामी का उत्सव मत मनाओ..! वीर सावरकर काला पानी में पहले ऐसे कैदी थे जिन्होंने काल कोठरी की दीवारों पर कंकर कोयले से कवितायें लिखीं और 6000 पंक्तियाँ याद रखी..!


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