खिचड़ी का इतिहास है हजारों वर्ष पुराना,जानकर होगी हैरानी
शायद आपको जानकर भी हैरानी होगी कि 14वीं सदी में मोरक्को यात्री इब्नबतूता ने भी खिचड़ी का जिक्र किया है. वहीं, 15वीं सदी के रूसी यात्री अफानासी निकितिन ने भी इसके बारे में बताया है. तो आपको बता दें कि खिचड़ी का चलन मुगल काल में और ज्यादा हो गया था. चलिए आज हम आपको खिचड़ी के इतिहास के बारे में बताते हैं.
क्या है खिचड़ी का इतिहास ?
माना जाता है कि खिचड़ी का इतिहास करीब 2000 साल पुराना है. माना जाता है कि भारत में खिचड़ी पिछले करीब दो हजार साल से खाई जाती है. ये भी माना जाता है कि 1200 ईसा पूर्व में भी खिचड़ी खाई जाती थी. इस तथ्य के तो आर्कियोलॉजिकल सबूत भी मिले हैं.
एक लेख के अनुसार, खिचड़ी शब्द संस्कृत के 'खिच्चा' से बना है. ये चावल और दाल से बनाई जाती है।
इसके नाम अनेक हैं- खिचड़ी(हिन्दी), खिचुरी (बांग्ला), किसुरी (सिलेटी), खेचिड़ी (उड़िया), बिसी बेले भात, वेन पोंगल. बनाने के तरीके में भी थोड़ी-बहुत भिन्नता मिल जाएगी.
खिचड़ी के चावल से चंद्रमा, नमक से शुक्र, हल्दी से गुरु, हरी सब्जियों से बुध और खिचड़ी के ताप से मंगल का संबंध है। काली ऊड़द की दाल और तिल को मकर संकांति पर बनाने वाली खिचड़ी में प्रयोग किया जाता है, जिसके दान और सेवन से सूर्य देव और शनि देव की कृपा मिलती है।
अकबर को भी थी पसंद
खिचड़ी हमेशा से ही डिमांड में रही है. मुगल बादशाहअकबर को भी खिचड़ी बेहद पसंद थी. बीरबल की खिचड़ी वाली कहानी हम सभी ने सुनी है. अकबर के नवरत्नों में से एक अबुल फजल रोज़ाना 1200 किलोग्राम खिचड़ी बनवाते थे.
शनिदेव को पसंद है काली दाल खिचड़ी
हिन्दू पौराणिक कथाओं में भी खिचड़ी का उल्लेख किया गया है. ग्रंथो में बताया गया है कि शनिदेव को काली दाल की खिचड़ी बहुत पसंद है.
महाभारत में खिचड़ी का उल्लेख
महाभारत में खिचड़ी का उल्लेख मिलता है. कुछ विद्वानों की मानें तो द्रौपदी ने वनवास के दौरान पांडवों को खिचड़ी बनाकर खिलाई थी. द्रौपदी के पास एक दिव्य पात्र था जिसमें तब तक खाना खत्म नहीं होता था जब तक द्रौपदी ने खाना न खा लिया हो. द्रौपदी ने उस दिन भोजन ग्रहण कर लिया था और ऋषि दुर्वासा असंख्य अनुयायियों के साथ द्रौपदी के घर पहुंच गए. ऋषि दुर्वासा अत्यंत क्रोधी ऋषि थे और किसी को भी श्राप दे देते थे. द्रौपदी की रसोई में अन्न का एक दाना भी नहीं था. वो चिंता में पड़ गई कि अब करें तो करें क्या. ऐसे में श्रीकऋष्ण द्रौपदी की सहायता को आगे आए. पात्र में एक चावल का दाना था, कृष्ण ने उसे ग्रहण किया और ऋषि समेत सभी अनुयायियों का पेट भर गया.
ब्रिटेन की महारानी को भी पसंद थी खिचड़ी
ब्रिटेन की महारानी क्वीन विक्टोरिया के घर तक भी पहुंची खिचड़ी. और इसका श्रेय जाता है उनके उर्दू के उस्ताद, मुंशी अब्दुल करीम को. मसूर की दाल उन्हें बहुत पसंद थी, और यहीं से 'मल्लिका मसूर' नाम पड़ा.
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