क्या है पंचामृत और चरणामृत
पंचामृत का मतलब पांच पवित्र खाद्य पदार्थ से मिलकर बना एक शुद्ध पेय. वहीं चरणामृत भगवान विष्णु के चरणों के जल को कहते हैं. इसे तांबे के पात्र में रखा जाता है इसमें तुलसी और तिल मिलाए जाते हैं. जिससे तांबे के औषधीय गुण जल में आ जाते हैं.
पंचामृत बनाने का तरीका
पंचामृत बनाने के लिए गाय का दूध, गाय का घी, दही, शहद और शक्कर की ज़रूरत होती है. सभी को एक साथ मिलाकर पंचामृत बनाया जाता है।
पांचों तत्व किसके प्रतीक हैं
दूध-
दूध पंचामृत का प्रथम भाग है. हमारा जीवन दूध की तरह निष्कलंक होना चाहिए.
दही-
दही का गुण है यह दूसरों को अपने जैसा बना लेता है. दही चढ़ाने का अर्थ है कि हम दूध जैसे निष्कलंक हो कर सद्गुण को अपनाएं.
घी-
घी स्नेह का प्रतीक है. घी की भावना है कि सभी से हमारे स्नेहयुक्त संबंध हो.
शहद-
शहद मीठा होने के साथ ही शक्ति का भी प्रतीक है. तन और मन से शक्तिशाली व्यक्ति ही सफलता पा सकता है.
शक्कर-
शक्कर का गुण है मिठास, शकर मिलाने से जीवन में मिठास घुलती है. मीठा बोलना सभी को अच्छा लगता है.
पंचामृत खाने के फायदे
पंचामृत के सेवन से शरीर रोग मुक्त रहता है. जिस तरह से भगवान को पंचामृत से स्नान कराया जाता है उसी तरह अगर इंसान भी स्नान करता है तो उसके शरीर की कांति बढ़ती है. अमृत को अधिक मात्रा में सेवन नहीं करना चाहिए.
चरणामृत बनाने का तरीका
तांबे के पात्र में जल लें जिससे उसमें तांबे के औषधीय गुण आ जाते हैं. चरणामृत में तुलसी पत्ती, और तिल मिलाएं. मंदिर या घर में हमेशा तांबे के कलश में तुलसी मिला जल रखाना ही चाहिए.
चरणामृत के फायदे
चरणामृत को आयुर्विज्ञान की दृष्टि से स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी माना गया है. आयुर्वेद के अनुसार तांबे में अनेक रोगों को नष्ट करने के गुण होते हैं. यह पौरूष शक्ति बढ़ाता है. तुलसी एक एंटीबायोटिक है. इसमें कई रोग दूर करने की क्षमता होती है. इसका जल मस्तिष्क को शांति और निश्चिंतता प्रदान करता है. चरणामृत बुद्धि, स्मरण शक्ति को बढ़ाने में भी कारगर होता है.
चरणामृत लेने के नियम
चरणामृत लेने के बाद कभी भी उस हाथ को सिर पर ना फेरे जिससे चरणामृत ग्रहण किया हो. शास्त्रीय मत के अनुसार ऐसा नहीं करना चाहिए. इससे नकारात्मक प्रभाव बढ़ता है. चरणामृत हमेशा दाएं हाथ से लेना चाहिए और भक्तिपूर्वक मन को शांत रखकर ग्रहण करना चाहिए.