भारत भूषण, भुला दिया गया चेहरा
जब फर्श से अर्श पर और अर्श से वापस फर्श पर आने वाले कलाकारों की बात होती है तो भारत भूषण की याद ज़रूर आती है. ये बंदा अपने सरकारी वकील पिता की मर्ज़ी के विरुद्ध अलीगढ़ से बंबई आया था. किसी ने एक चिट्ठी भी दी थी, महबूब खान के नाम. लेकिन उन्होंने उसे ढंग से देखा तक नहीं, बेरुखी से कह दिया, अभी कोई काम नहीं है. फिर बंदा इधर-उधर भटका फिरा. केदार शर्मा ने 'चित्रलेखा' (1941) में एक छोटा सा रोल दिया. फिल्म तो ज़बरदस्त चली, लेकिन भारत भूषण नही. किसी ने नोटिस ही नहीं किया उनको. एक हमदर्द ने उन्हें भक्त कबीर' (1942) बना रहे डायरेक्टर रामेश्वर शर्मा से मिलवाया. एक ही रोल बचा था, काशी नरेश का. फिल्म चली और भारत भूषण की ज़िंदगी को भी साँस मिली. केदार शर्मा की 'सुहागरात' (1948) ज़बरदस्त हिट हुई. लेकिन ये नायिका गीताबाली के लिए टर्निंग पॉइंट साबित हुई. भारत भूषण की अभी स्ट्रगल अभी बाकी थी. और चार साल तक भटकने के बाद विजय भट्ट की 'बैजू बावरा' (1952) अंततः निर्णायक मोड़ बनी. मीना कुमारी नायिका थी, तू गंगा की मौज मैं जमुना की धारा...मन तड़पत हरी दर्शन को आज...ओ दुनिया के रखवाले सुन दर्द भरे मेरे नाले...
पचास का वो दशक भारत भूषण के नाम ही रहा. भाई बहन, आनंद मठ, मां, मिर्ज़ा ग़ालिब, बसंत बहार, फागुन, बरसात की रात...आदि अनेक फ़िल्में क़ामयाब रहीं. 'चैतन्य महाप्रभु' (1954) के लिए उन्हें बेस्ट एक्टर का फिल्मफेयर अवार्ड मिला. लेकिन एक दिक्कत सदैव रही उनके साथ. वो टाइपकास्ट हो गए. सूरदास का रोल हो या कालिदास का, फक्कड़ कवि हो शायर या फिर ग़रीब लेखक, भारत भूषण ही याद आते रहे सबको.
उन्होंने सिर्फ एक्टिंग ही नहीं की, स्क्रिप्ट भी लिखीं, बरसात के रात, नई उमर की नई फसल, बसंत बहार आदि. मधुबाला के साथ 'बरसात की रात' (1960) में वो पूरे शबाब पर थे, ज़िंदगी भर नहीं भूलेगी वो बरसात की रात...मैंने शायद तुम्हें पहले भी कहीं देखा है...इसी फिल्म में वो और उनकी पत्नी सरला मधुबाला के करीब आये, मधु के दुःख-दर्द शेयर किये. मगर तभी एक ट्रेजडी भी हुई. सरला की प्रसव उपरांत कष्टों के चलते मृत्यु हो गयी. भारत भूषण बुरी तरह टूट गए. फिल्मों के ऑफर ठुकराने लगे. ज़िंदगी में लौटने के लिए उन्होंने दोबारा शादी की. लेकिन गुज़रा वक़्त लौट कर नहीं आता. मुगल हिस्ट्री की पृष्ठभूमि पर माला सिन्हा वाली 'जहाँआरा' (1964) बावजूद हिट गीत-संगीत के भी नहीं चली, फिर वही शाम वही ग़म वही तन्हाई है...मैं तेरी आँख के आंसू पी जाऊं...मैं तेरी नज़र का सरूर हूँ...
भारत भूषण ने बी.सरोजा देवी के साथ 'दूज का चांद' (1965) प्रोड्यूस करके फिर उठने का प्रयास किया, महफ़िल से उठ जाने वालों तुम लोगों पे क्या इलज़ाम...मगर फ्लॉप हो गयी. काफी पैसा डूब गया. भाई रमेश चंद्रा की फिल्मों में इन्वेस्ट किया. इनमें नई उमर नई फसल प्रमुख है. नीरज के गीतों और रोशन के संगीत ने धूम मचा दी - देखती ही रहो दर्पण न तुम...आज की रात बड़ी शोख बड़ी नटखट है... कारवां गुज़र गया गुब्बार देखते रहे... लेकिन गया माल वापस नहीं आया. बंगले, ज़ेवर, कारें सब धीरे-धीरे बिकने लगे. रही सही कसर डिप्रेशन और शराब ने पूरी कर दी. सुना था कि जुआ भी खेलते थे. छोटी छोटी चरित्र भूमिकाएं करने लगे, पापी पेट का सवाल जो ठहरा. तक़दीर, प्यार का मौसम, खून पसीना, याराना, नास्तिक, शराबी, चांदनी, तूफ़ान आदि अनेक फिल्मों में उनकी झलक भर दिखी. कई में तो मानों किसी ने तरस खा कर फिल्म में खड़ा कर दिया हो. हालात तो यहाँ तक पहुंचे कि वो जूनियर आर्टिस्ट भी बनने को तैयार हो गए. ईलाज के लिए भी पैसे नहीं होते थे. अंततः 231 फिल्मों में दिखा ये बेहतरीन आर्टिस्ट और गीत-संगीत का ज़बरदस्त जानकार 27 जनवरी 1992 को 72 की उम्र में देह छोड़ गया. खाली हाथ आया था, खाली हाथ चला गया. अफ़सोस कि उनके जाने पर फ़िल्मी दुनिया को कोई फ़र्क नहीं पड़ा और मीडिया में कोई बड़ी हलचल नहीं हुई.
© Vir Vinod Chhabra
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