कमल कपूर का जन्म 1920 में लाहौर, पंजाब में हुआ। उन्होंने लाहौर के ही डीएवी कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की। वे पृथ्वीराज कपूर के चचेरे भाई और गोल्डी बहल के नाना थे।
पृथ्वी थिएटर” के नाटक “दीवार” में अंग्रेज़ अधिकारी की भूमिका के साथ कमल कपूर ने अभिनय की दुनिया में पहला कदम रखा था।
उन्होने अपने सफर की शुरुआत 1940-50 के दौर में नायक के रूप में की थी। उनकी पहली फ़िल्म "दूर चलें" थी जो 1946 मे प्रदर्शित हुई।
उन्होंने 1950 के दशक में ‘सुन तो ले हसीना’, ‘मैंने जीना सीख लिया’ और ‘खूबसूरत धोखा’ जैसी फिल्मों में नायक की भूमिका की थी।
कमल कपूर के करियर का खलनायकी का दौर सही मायनों में साल 1965 में बनी फ़िल्म “जौहर महमूद इन गोवा” से शुरू हुआ। इसका श्रेय वो मशहूर निर्माता-निर्देशक (स्वर्गीय) यश जौहर को देते थे। उनके मुताबिक, “यश के ज़हन में नाटक “दीवार” की मेरी भूमिका ताज़ा थी इसलिए फ़िल्म “जौहर महमूद इन गोवा” में अंग्रेज़ खलनायक की भूमिका के लिए आई.एस.जौहर को मेरा नाम यश जौहर ने ही सुझाया था”।
इस फ़िल्म की कामयाबी के साथ ही कमल कपूर के अच्छे दिनों की शुरूआत हुई और आगे चलकर उन्होंने “जौहर इन बॉम्बे”, “जौहर महमूद इन हांगकांग”, “जब जब फूल खिले”, “राजा और रंक”, “दस्तक”, “पाकीज़ा”, “पापी”, “चोर मचाए शोर”, “फ़ाईव राईफ़ल्स”, “दो जासूस”, “दीवार”, “खेल खेल में”, “मर्द” और “तूफ़ान” जैसी कई फ़िल्मों में छोटी-बड़ी भूमिकाएं कीं
आगे चलकर वो चरित्र भूमिकाएं करने लगे थे|
ज़िंदगी के क़रीब 50 साल हिंदी सिनेमा को देने वाले अभिनेता कमल कपूर का निधन 2 अगस्त 2010 को 90 साल की उम्र में मुंबई में हुआ।
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