राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त : राष्ट्रभक्ति साहित्य के शिल्पकार...3 अगस्त-जन्म दिवस विशेष

मैथिलीशरण गुप्त हिन्दी भाषा के एक ऐसे ही महान कवि थे, जिन्हें राष्ट्रकवि का गौरव प्रदान किया गया।

श्री मैथिलीशरण गुप्त का जन्म चिरगाँव (झाँसी, उ.प्र.) में 3 अगस्त, 1886 को हुआ था। सम्पन्न वातावरण में उनका बचपन सुखपूर्वक बीता। उन दिनों व्यापारी अपना व्यापारिक हिसाब-किताब प्रायः उर्दू में रखते थे। अतः इनके पिता ने प्रारम्भिक शिक्षा के लिए इन्हें मदरसे में भेज दिया। वहाँ मैथिलीशरण गुप्त अपने भाई सियाराम के साथ जाते थे।

पर मदरसे में उनका मन नहीं लगता था। वे बुन्देलखण्ड की सामान्य वेशभूषा अर्थात ढीली धोती-कुर्ता, कुर्ते पर देशी कोट, कलीदार और लाल मखमल पर जरी के काम वाली टोपियाँ पहन कर आते थे। वे प्रायः अपने बड़े-बड़े बस्ते कक्षा में छोड़कर घर चले जाते थे। सहपाठी उनमें से कागज और कलम निकाल लेते। उनकी दवातों की स्याही अपनी दवातों में डाल लेते; पर वे कभी किसी से कुछ नहीं कहते थे।

उन दिनों सम्पन्न घरों के बच्चे ईसाइयों द्वारा सचालित अंग्रेजी विद्यालयों में पढ़ते थे। अतः पिताजी ने इन्हें आगे पढ़ने के लिए झाँसी के मैकडोनल स्कूल में भेज दिया; पर भारत और भारतीयता के प्रेमी मैथिलीशरण का मन अधिक समय तक यहाँ भी नहीं लग सका। वे झाँसी छोड़कर वापस चिरगाँव आ गये। अब घर पर ही उनका अध्ययन चालू हो गया और उन्होंने संस्कृत, बंगला और उर्दू का अच्छा अभ्यास कर लिया।

इसके बाद गुप्त जी ने मुन्शी अजमेरी के साथ अपनी काव्य प्रतिभा को परिमार्जित किया। झाँसी में उन दिनों आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी रेलवे में तारबाबू थे। उनके सम्पर्क में आकर गुप्त जी ने खड़ी बोली में लिखना प्रारम्भ कर दिया। बोलचाल में वे बुन्देलखण्डी में करते थे; पर साहित्य लेखन में उन्होंने प्रायः शुद्ध और परिमार्जित हिन्दी का प्रयोग किया। उनके साहित्य में हर पग पर राष्ट्र और राष्ट्रभाषा से प्रेम की सुगन्ध आती है।

12 साल की उम्र में ही उन्होंने कविता रचना शुरू कर दी थी। “ब्रजभाषा” में अपनी रचनाओं को लिखने की उनकी कला ने उन्हें बहुत जल्दी प्रसिद्ध बना दिया। 

गुप्त जी को अपनी भाषा, बोली, क्षेत्र, वेशभूषा और परम्पराओं पर गर्व था। वे प्रायः बुन्देलखण्डी धोती और बण्डी पहनकर, माथे पर तिलक लगाकर बड़ी मसनद से टिककर अपनी विशाल हवेली में बैठे रहते थे। उनका हृदय सन्त की तरह उदार और विशाल था। साहित्यप्रेमी हो या सामान्य जन,कोई भी किसी भी समय आकर उनसे मिल सकता था। राष्ट्रकवि के रूप में ख्याति पा लेने के बाद भी बड़प्पन या अहंकार उन्हें छू नहीं पाया था।

देशभक्ति से भरपूर रचनाएं लिख उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में एक अहम काम किया। वे भारतीय संस्कृति एवं इतिहास के परम भक्त थे। परंतु अंधविश्वासों और थोथे आदर्शों में उनका विश्वास नहीं था। 

यों तो गुप्त जी की रचनाओं की संख्या बहुत अधिक है; पर विशेष ख्याति उन्हें ‘भारत-भारती’ से मिली। उन्होंने लिखा है –

मानस भवन में आर्यजनजिसकी उतारें आरती

भगवान् भारतवर्ष में गूँजे हमारी भारती।।

गुप्तजी को 1952 में राज्यसभा सदस्यता दी गई और 1954 में उन्हें पद्मभूषण से नवाजा गया। इसके अतिरिक्त उन्हें हिन्दुस्तानी अकादमी पुरस्कार, साकेत पर इन्हें मंगला प्रसाद पारितोषिक तथा साहित्य वाचस्पति की उपाधि से भी अलंकृत किया गया। काशी विश्वविद्यालय ने उन्हें डी.लिट्. की उपाधि प्रदान की।

मैथिलीशरण गुप्त जी के साहित्य पर हिन्दीभाषी क्षेत्र के सभी विश्वविद्यालयों में शोध हुए हैं। सभी साहित्यकारों ने उनके कृतित्व पर लिखकर अपनी लेखनी को धन्य किया है। भारत भारती के इस अमर गायक का निधन 12 दिसम्बर, 1964 को चिरगाँव में ही हुआ।

Post a Comment

Previous Post Next Post