भगवान दादा...जानिये उनकी ज़िंदगी के अनसुने किस्से....01 अगस्त जन्मदिन विशेष

एक अगस्त 1913 को महाराष्ट्र में जन्मे भगवान दादा के पिताजी मिल मजदूर थे. अभिनेता भगवान दादा का असल नाम था भगवान अबाजी पांडव. 

उनका बचपन गुरबत में बीता. दादर, परेल के मजदूर इलाकों में खेले-बढ़े. चौथी कक्षा के बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी. बाद में वे अपने समय के सबसे धनी अभिनेताओं में से एक बने.

उन्हें फिल्मों में पहला ब्रेक एक मूक फिल्म में मिला. अभिनय के बाद उन्होंने फिल्म निर्देशन में भी आजमाया. अलबेला (1951) और उसके गीत “शोला जो भड़के” और “भोली सूरत दिल के खोटे” आज भी याद किये जाते हैं.
 भगवान दादा की पहली बोलती फिल्म “हिम्मत-ए-मर्दा” (1934) थी. इस फिल्म से एक दुखद किस्सा जुड़ा हुआ है. फिल्म में मुख्य भूमिका में ललिता पवार थीं. फिल्म की शूटिंग के दौरान भगवान दादा को ललिता पवार को थप्पड़ मारना था।
सीन में असलियत का अहसास लाने के लिए भगवान दादा ने थोड़ा ज्यादा ही कस कर थप्पड़ मार दिया जिससे ललिता पवार के आँख के करीब की एक नस फट गई. इस दुर्घटना के बाद ललिता पवार की एक आँख पहले ही तरह पूरी तरह नहीं खुलती थी जिसकी वजह से उन्हें हिरोइन के बजाय चरित्र भूमिकाएं ही ऑफर की जाने लगीं. 

गीतकार आनंद बक्शी को भी फिल्मों में लाने में भगवान दादा का योगदान था. 

हिंदी फिल्मों में लाए डांस का अलग स्टाइल...

हिन्दी फ़िल्मों में डांस का एक अलग ही स्टाइल शुरू करने वाले भगवान दादा ऐसे 'अलबेला' सितारे थे, जिनसे अमिताभ बच्चन सहित आज की पीढ़ी तक के कई एक्टर्स मोटिवेट हुए. मगर कभी सितारों से अपने इशारों पर काम कराने वाले भगवान दादा का करियर एक बार जो फिसला तो फिर फिसलता ही गया. 

कभी जुहू में समंदर के ठीक सामने उनका 25 कमरों वाला बंगला था. उनके पास सात गाड़ियां थीं. हफ्ते के हर दिन के लिए अलग-अलग. उनके पास चेंबूर में आशा स्टूडियो भी था.
आर्थिक तंगी का हाल यह था कि उन्हें रोजी-रोटी के लिए छोटे-छोटे रोल तक करने पड़े.
उत्तरोत्तर असफलता के बाद वे दादर में दो कमरे वाली चॉल में रहने लगे. वहीं दिल का दौरा पड़ने से उनका देहांत हुआ.

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