गुरुदेव रविंद्र नाथ ठाकुर के खानदान मे एक बाल विधवा समाज के इस कुप्रथा का विरोध कर बैठी वह उनके रिश्ते मे भाई सुकुमार ठाकुर की बेटी थी उम्र भर विधवा होने का विरोध किया और सब कुछ ठुकरा कर ईसाई धर्म अपना लिया और मेरठ आकर एक कहानीकार प्यारे लाल शादी रचा लिया. इन दोनों की एक बेटी हुई और नाम रखा प्रभावती।
प्रभावती बड़ी हुई काम की तलाश मे मुम्बई आ गयी और मुलाकात हुई संगीतकार गुलाम अली बख्श से अली बख्श हारमोनियम बादक थें. बाद मे दोनों शादी कर लिये प्रभावती अब इकबाल बानो थी और दोनों की एक संतान 1 अगस्त1932 को हुई "महजबी बानो " जिसे हम - आप ट्रेजेडी क्वीन मीना कुमारी के नाम से जानते हैं।
मजहबीं बानो तीन बहनें थी बड़ी बहन खुर्शीद और छोटी मधु. मजहबीं बानो मुफलिसी के कारणवश महज़ चार वर्ष की उम्र मे पहली फिल्म लेदर फेस जिसके निर्देशक थें विजन भट्ट. मे काम करना पड़ा जिसके लिये उन्हें बतौर परिश्रमिक महज़ पच्चीस रुपये मिलें. और फिर मुफलिसी के दौर मे कैमरे से दोस्ती बढ़ती गयी आठ वर्ष की उम्र मे दो फिल्में और मिली "एक ही भूल"और "पूजा" साथ ही साथ गानें का भी शौक महजबीं बानो को रहा इस तरह महजबीं बानो जिन्दगी से जद्दोजहद करने लगी।
मीना कुमारी की कोई औपचारिक शिक्षा-दीक्षा नही हुई लेकिन घर पर ही ऊर्दू, अंग्रेजी, हिन्दी की शिक्षा प्रबंध उनके पिता ने घर पर ही कर दिया।
लेकिन मीना कुमारी का बचपन झंझावतो के दौर से गुजर रहा था. माँ - बाप के कलह और दिन भर काम के बोझ के बाद रात की तन्हाइयों मे दिल के दर्द को शायरी की शक्ल मे उकेरने लगी मीना कुमारी. तभी महज़ चौदह वर्ष की उम्र मे उनकी माँ का कैंसर से निधन हो गया।
अब मीना कुमारी को पैसों के लिये हर तरह की फिल्मों काम किया उन्हें उस दौर मे अधिकांशतः सी ग्रेड की फिल्में ही मिला करती थी फिर भी सराहा गया. 1950 के आस - पास ओमी वाडिया की फिल्म अलादीन का चिरांग के लिये उन्हें बतौर परिश्रमिक दस हजार मिलें और तब जाकर वह अपनी पहली कार खरीदा और मुम्बई की सड़कों पर ड्राईविंग का शौक पूरा किया।
उसी दौर मे आयी अशोक कुमार की फिल्म तमाशा जो बहुत नही चला मीना कुमारी को एक रोल मिला और वही सेट पहली बार उनसे कमाल अमरोही की मुलाकात हुई।
कुछ महिनों बाद निर्देशक कमाल अमरोही अपनी फिल्म अनारकली के लिये मीना कुमारी को अपने सेक्रेट्री से पैगाम भिजवाया और मीना कुमारी मान गयी तमाम जद्दोजहद के बाद फिल्म के निर्माता ने उन्हें पन्द्रह हजार रुपये मे साईनिंग अमाउंट दिया. इस फिल्म को पाकर मीना कुमारी बहुत खुश थी. लेकिन तभी पुणे मे कार एक्सीडेंट कर बैठी और हास्पिटलाईज होना पड़ा और इसी दौर मे तबियत का हाल जानने के लिये कमाल अमरोही का मुम्बई आना-जाना शुरु हुआ और यही से मोहब्बत की शुरुआत हुई.
फिर वह तारीख आयी 14 फरवरी 1952 को हमेशा की तरह मीना कुमारी के पिता अली बख़्श उन्हें व उनकी छोटी बहन मधु को रात्रि 8 बजे पास के एक भौतिक चिकित्सकालय (फिज़्योथेरेपी क्लीनिक) छोड़ गए। पिताजी अक्सर रात्रि 10 बजे दोनों बहनों को लेने आया करते थे।उस दिन उनके जाते ही कमाल अमरोही अपने मित्र बाक़र अली, क़ाज़ी और उसके दो बेटों के साथ चिकित्सालय में दाखिल हो गए और 19 वर्षीय मीना कुमारी ने पहले से दो बार शादीशुदा 34 वर्षीय कमाल अमरोही से अपनी बहन मधु, बाक़र अली, क़ाज़ी और गवाह के तौर पर उसके दो बेटों की उपस्थिति में निक़ाह कर लिया। 10 बजते ही कमाल के जाने के बाद, इस निक़ाह से अपरिचित पिताजी मीना को घर ले आए।
लेकिन मीना कुमारी के पिता को किसी तरह इस बात खबर लग गई मीना कुमारी पर पिता ने कमाल से तलाक लेने का दबाव डालना शुरू कर दिया। मीना ने फैसला कर लिया की तबतक कमाल के साथ नहीं रहेंगी जबतक पिता को दो लाख रुपये न दे दें।पिता अली बक़्श ने फिल्मकार महबूब खान को उनकी फिल्म अमर के लिए मीना की डेट्स दे दीं परंतु मीना अमर की जगह पति कमाल अमरोही की फिल्म दायरा में काम करना चाहतीं थीं।इसपर पिता ने उन्हें चेतावनी देते हुए कहा कि यदि वे पति की फिल्म में काम करने जाएँगी तो उनके घर के दरवाज़े मीना के लिए सदा के लिए बंद हो जाएँगे। 5 दिन अमर की शूटिंग के बाद मीना ने फिल्म छोड़ दी और दायरा की शूटिंग करने चलीं गईं।उस रात पिता ने मीना को घर में नहीं आने दिया और मजबूरी में मीना पति के घर रवाना हो गईं। अगले दिन के अखबारों में इस डेढ़ वर्ष से छुपी शादी की खबर ने खूब सुर्खियां बटोरीं।
लेकिन इसी दौर मे मीना कुमारी की दो फिल्में रिलीज हुई एक फूटपाथ और दूसरी बैजू - बावरा और इन फिल्मों ने मीना कुमारी का स्टारडम सातवें आसमान पर पहुँचा दिया।
साल 1952 में रिलीज हुई फिल्म बैजू बावरा से मीना कुमारी को असल शोहरत प्राप्त हुई। यह फिल्म लोगों को इतनी पंसद आई थी कि 100 हफ्तों तक थियेटर में लगी रही।
मीना कुमारी के बायें हाथ की छोटी उंगली किसी वजह से कट गई थी इस वजह से शूट के दौरान वह अक्सर यह उंगली छुपा लिया करती थीं।
बाद मे पिता से बगावत करके मीना कुमारी कमाल अमरोही के साथ रही लेकिन तन्हाइयों ने वहा भी उनका साथ नही छोड़ा और एक औलाद की उनकी इच्छा नही पूरी हो सकी वैसे मीना कुमारी एक फिल्म मेरे अपने मे माँ की या फिर यूँ कहिये की एक बेटा ममता की तलाश करता है और इक बेसहारा को एक बेटा मिल जाता है बड़ी मार्मिक फिल्म है चूंकि इस फिल्म मे मीना कुमारी लीड रोल मे नही हैं इसलिये इसकी चर्चा कम होती है।
खैर कमाल अमरोही की पाकीजा मे वाकई मे इस ट्रेजेडी क्वीन ने दमदार अभिनय करके इस फिल्म को अमर कर दिया।
12 साल बाद कमाल से उनका तलाक़ हो गया ,मीना कुमारी से तलाक के बाद कमाल को अपनी गलती का अहसास हुआ। वह मीना को दोबारा हासिल करना चाहते थे। लेकिन इस्लामिक धर्म के अनुसार यह केवल हलाला के बाद ही मुमकिन था। कमाल ने अपने दोस्त और जीनत अमान के पिता अमानउल्लाह खान के साथ उनका हलाला करवाया और एक महीने बाद उनका दोबारा मीना कुमारी से निकाह हुआ। हालांकि मीना कुमारी हलाला के बाद पूरी तरह से टूट गई थीं। इस बारे में मीना कुमारी ने लिखा भी था, 'धर्म के नाम पर मुझे दूसरे मर्द को सौंपा गया तो मुझमें और वेश्या में क्या फर्क रह गया।' मशहूर निर्माता निर्देशक बी आर चोपड़ा ने साल 1982 में इस वाकये पर फिल्म बनाई, निकाह।
मीना कुमारी को शायरी को भी बहुत शौक था। वह नाज नाम से शेरो शायरी किया करती थीं।
मीना कुमारी ने मुमताज को अपना कार्टर रोड स्थित बंगला उपहार के स्वरूप दिया था। दरअसल मुमताज ने एक बार मीना कुमारी के लिए एक फिल्म में काम किया था।
एक बार शास्त्री जी को 'पाकीजा' फिल्म की शूटिंग देखने के लिए आमंत्रित किया गया था,उन्हें मीना कुमारी ने स्वागत में हार दिया तो शास्त्री जी ने पूछा ये कौन हैं तब उन्हें पता चला , तब तक उन्होंने मीना कुमारी का नाम भी नहीं सुना था,उन्होंने अपने भाषण में इस बात का उल्लेख किया,इतने सादगी भरे थे वह।
जिन्दगी भर तन्हाइयों और अपनों से चोट खा- खा कर शराब के नशे मे चूर होकर इस जिस्म से रूह को 31 मार्च 1972 को अलविदा कह दिया.
लेकिन आज भी बेहतरीन संवाद अदायगी फनकारों की कद्रानों की दिलों कही ना कही जिंदा हैं मीना कुमारी
-----avdhesh maurya
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