मध्यप्रदेश के बुरहानपुर जिले का असीरगढ़ किला,जिसने कई लड़ाईयां, युग और शासन देखें।
यह किला बुरहानपुर से इंदौर इच्छापुर हाइवे पर 20 किमी. दूर सतपुड़ा पर्वत श्रृंखला पर तकरीबन 250 मीटर की ऊँचाई पर बसा हुआ है।
इस किले की रोमांचक बात यह है कि जिसने भी अपनी ताकत से किले को जीतना चाहा, उसे सिर्फ़ हार ही मिली। यह कहा गया कि जितने भी शासकों ने किले पर राज किया, सबने किले को छल–कपट से अपने कब्जे में किया था।
भारत में ब्रिटिश हुकूमत के समय यह अंग्रेजों के हाथों में था। उससे पहले मुगलों ने भी किले पर शासन किया।
इस तरह से पड़ा किले का नाम
इतिहासकारों के अनुसार, किले का निर्माण रामायण काल यानी 14वीं शताब्दी में हुआ था
असीरगढ़ नाम के पीछे भी एक कहानी जुड़ी हुई है। कहानी कहती है, जहां इस समय असीरगढ़ किला है वहाँ कभी आशा अहीर नाम का व्यक्ति रहने आया था ,जिसके पास हज़ारों पशु थें। उस व्यक्ति ने पशुओं की सुरक्षा के लिए ईंट, मिट्टी, चूना–पत्थरों से दीवार बनाई थी। कहानी को देखते हुए, अहीर के नाम पर असीरगढ़ किले का नाम पड़ गया।कहा जाता है कि कई समय तक यहां चौहान वंश के राजाओं ने राज किया था।
मान्यता है - ये है अश्वत्थामा का पूजास्थल
कहा जाता है कि किले में महाभारत से जुड़े कई पात्र हैं जिसमें से एक है अश्वत्थामा।अश्वत्थामा, गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र थे।जिन्होंने कौरवों और पांडवों को शस्त्र विद्या का ज्ञान दिया था। पिता की मृत्यु के बाद, श्री कृष्ण द्वारा उसे युगों–युगों तकभटकने का श्राप मिला था।
लोगों का मानना है कि वह पांच हज़ारों सालों तक किले मेंही भटक रहा था। साथ ही यह भी कहा जाता है कि वह अमावस्या और पूर्णिमा में किले में मौजूद गुप्तेश्वर मंदिर में भगवान शिव की पूजा करता था। यह सब सिर्फ लोगों की मान्यता है कि अश्वत्थामा किले में रहा करता था। जबकि ऐसी किसी भी बात की पुष्टि नहीं की गयी है।
किले से जुड़ी अनोखी बातें
किले को तीन भागों में बांटा गया है।ऊपरी हिस्सा असीरगढ़, बीच का कामरगढ़ और निचला हिस्सा मलयगढ़ कहलाता है।किला 60 एकड़ में फैला हुआ है। किले में पांच तालाब है। लेकिन यह तालाब कभी–भी किसी भी मौसम में नहीं सूखते। यह बात लोगों को काफ़ी हैरान करती है।
गंगा और यमुना नाम के दो कुंड भी किले में मौजूद है। ऐसा कहा जाता है कि दुश्मनों को मारकर इन कुंडों में डाल दिया जाता था। साथ ही जब श्री कृष्ण ने अश्वत्थामा को श्राप दिया था तबवह इन्हीं तालाब में नहाने के लिए आया था। ऊंचाई से देखने पर किले में मंदिर और मस्जिद भी दिखाई पड़ता है।
किले से दिखता मंदिर, शिव मंदिर है जिसे गुप्तेश्वर मंदिर के नाम से जाना जाता है। साथ ही शिव मंदिर में मोहम्मद ज़हीर अल्लाह की पूजा भी की जाती है। कहा जाता है कि यह मंदिर दोनों धर्मों की एकता का प्रतीक है। मंदिर के चारों ओर गहरी खाईयां हैं। लेकिन ऊंचाई से पेड़ों से घिरी यह खाईयां देखने में बेहद खूबसूरत लगती है।
किले में जाने के हैं, दो मार्ग -
किले तक आप दो रास्तों से पहुँच सकते हैं।एक रास्ता पूर्व से होकर जाता है। वहीं दूसरा रास्ता उत्तर दिशा में है। पूर्व दिशा से होकर जाने वाला रास्ता आसान है। लेकिन दूसरा खराब है , फिर भी उस रास्ते पर वाहन से जाया जा सकता है। इसके अलावा अगर आप पूर्व दिशा से जाना चाहते हैं तो किले तक पहुंचने के लिए सीढ़ियां भी बनाई गई हैं।आपको किले तक पहुंचने के लिए लगभग 1000 सीढ़ियां चढ़नी होगी। युवाओं के लिए यह काफी रोमांचकदायक है क्योंकि किलेके आस–पास घिरे पेड़–पौधे, पहाड़ और खाईयां मन मोहने वाले हैं जिसकी खूबसूरती को आप भी देखे बिना नहीं रह पाएंगे।
कूटनीति से अकबर ने किया था, किले पर कब्ज़ा -
जैसे–जैसे किला मशहूर हुआ, अकबर को भी किले की खबर लग गयी। उस समय पूरा देश अकबर के शासन में समाया हुआ था। अकबर ने किले को अपने कब्जे में करने की सोची। जिसकी जानकारी बहादुरशाह फारूखी को लग गयी।
उस समय असीरगढ़ किला बहादुरशाह फारुख़ी के आधिपत्य में ही था। अकबर द्वारा किले पर कब्जें करने की बात सुनकर उसने किले की सुरक्षा बढ़ा दी और किले में दस साल तक खाने की वस्तुओं को भी इंतज़ाम कर लिया।
ऐसे में अकबर को छः महीनों तक किले के बाहर ही खड़ा रहना पड़ा। किले की दीवार इतनी मजबूत थी कि किसी भी हमले से वह नहीं गिरी। जब अकबर द्वारा किये गए हमलों से भी कुछ नहीं हुआ तो उसने कूटनीति बनाई और बहादुरशाह फारुख़ी को पत्र लिखकर यह आश्वासन दिलाया कि वह उससे शांति से बात करना चाहते हैं।
पत्र पर विश्वास करके बहादुरशाह किले से बाहर निकल आए। अकबर से बातचीत के दौरान किसी ने उस पर पीछे से हमला किया और उसे बंदी बना लिया। 17 जनवरी 1601 ईसवीं में अकबर ने आखिर किले पर अपना कब्ज़ा जमा लिया।