बुरहानपुर - "शनवारा गेट" बुरहानपुर का मुख्य प्रवेश द्वार है, इस प्रवेश द्वार की कई विशेषताएं हैं। यह गेट तीन मंजिल का है, ग्राउंड, फर्स्ट एंड सेकंड।
तल मंजिल (ग्राउंड फ्लोर) पर आप देख सकते हैं कि आर्च और कमल का फूल जो अकबर बादशाह के जमाने का बना हुआ हिंदू और मुस्लिम एकता का प्रतीक, आर्च इस्लामिक संस्कृति का प्रतीक है और कमल का फूल हिंदू संस्कृति का।
फर्स्ट फ्लोर (प्रथम मंजिल) पर आप देख सकते हैं दो झरोखे और पीपल की तोरण, यह बादशाह जहांगीर के समय का है जहांगीर के लिए या जहांगीर के द्वारा जब-जब भी कोई कंस्ट्रक्शन किया या उनके लिए करवाया गया जैसे ओरछा, दतिया के महल या जयपुर में स्वागत जहां पर भी उनके लिए या उनके द्वारा कार्य किए गए थे जहांगिरी झरोखे आपको देखने को मिलेंगे साथ ही उस पर पीपल की तोरण हिंदू संस्कृति का प्रतीक है।
सेकंड फ्लोर (द्वितीय मंजिल) पर आपको 3 डोम देखने को मिलेंगे और उस पर जो नक्काशी डिजाइन की गई है वह कलगी डिजाइन है शाहजहॉं के काल में जब भी इस प्रकार के कार्य हुए हैं यहां तक कि आप ताजमहल के ऊपर भी इस कलगी डिजाइन को देख सकते हैं। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इस गेट के ऊपर नौ चिन्ह (साइन) कारविंग कीये गये है, जिसमें शहर का पक्षी, शहर के बगीचे फव्वारे और मुगलिया रेजीमेंट का निशान इस प्रकार के कार्य आपको किसी भी किले के गेट या परकोटे के गेट पर और वह भी तीन मंजिला गेट और निशान सारी चीजें कहीं भी देखने को नहीं मिलेगी।
इस दरवाजे का नाम "शनवारा गेट" यानी शनिवार गेट है, जैसा आप जानते हैं इस्लामिक शासन में आज भी शुक्रवार का दिन छुट्टी का दिन होता है और शनिवार का दिन पहला दिन होता है उस समय भी शुक्रवार छुट्टी का दिन था और शनिवार पहला दिन था इस गेट को दरे ए सफीर या हम यह कह सकते हैं कि सिफर ऐसे गरीब लोग ऐसे मामूली लोग जिनका प्रवेश शहर में वर्जित था वह लोग प्रति शनिवार को इस शनवारा गेट पर आ कर अपनी पीड़ा उस समय शहर के गवर्नर को या उस समय के शहर के सेनापति को या किसी अन्य मुख्य अधिकारी को बयान करते थे और उसका निदान अगले शनिवार तक हो जाना अनिवार्य था।
इसीलिए इस गेट को दर ए सफीर या गरीबों की पीड़ा सुनने वाला गेट भी कहा जाता था। इतनी सारी खूबियां इस गेट में थी।
-होशंग हवलदार