बुरहानपुर में पैदा हुई वह मुगल शहजादी जिसने औरंगजेब को तख्त तक पहुंचाया


मुगल इतिहास में कई ऐसी महिलाएं रहीं जिन्होंने सत्ता संघर्ष में अहम भूमिका निभाई, लेकिन समय के साथ उन्हें भुला दिया गया। उन्हीं में से एक थीं रोशनआरा बेगम—शाहजहां और मुमताज महल की बेटी, औरंगजेब की बहन, और एक कुशल रणनीतिकार। जिसका जन्म 3 सितंबर 1617 को मध्यप्रदेश के बुरहानपुर जिसे दक्कन का दरवाजा भी कहा जाता है में हुआ था।

जब शाहजहां के चारों बेटे—दारा शिकोह, औरंगजेब, शाह शुजा और मुराद—सत्ता के लिए आमने-सामने थे, तब रोशनआरा ने अपने भाई औरंगजेब का पूरा साथ दिया। यह वही दौर था जब शाहजहां अपने प्रिय पुत्र दारा शिकोह को गद्दी सौंपना चाहते थे और इसके लिए उन्होंने औरंगजेब को दिल्ली बुलाने की योजना बनाई।

परंतु, रोशनआरा ने इस षड्यंत्र की भनक पाते ही औरंगजेब को सावधान किया और उसे दिल्ली न आने की सलाह दी। यही वह निर्णायक क्षण था जिसने मुगल इतिहास की धारा ही मोड़ दी। अगर औरंगजेब दिल्ली आता, तो शायद वह सत्ता संघर्ष में हार जाता। लेकिन रोशनआरा की सतर्कता और चतुराई ने उसे इस संकट से बचा लिया।

दारा शिकोह की हत्या और शाहजहां की कैद

औरंगजेब ने अपनी सेना संग आगे बढ़ते हुए सत्ता संघर्ष में एक के बाद एक विजय प्राप्त की। अंततः, 1659 में, उसने अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी दारा शिकोह को मरवा दिया। दिलचस्प बात यह है कि इतिहासकारों के अनुसार, दारा की हत्या की सलाह भी रोशनआरा ने ही दी थी।

शाहजहां, जो अपने बेटे की मौत से टूट चुके थे, को भी आगरा के किले में कैद कर दिया गया। इस तरह, मुगल सल्तनत पर औरंगजेब का पूर्ण नियंत्रण स्थापित हो गया, और इसमें रोशनआरा की भूमिका सबसे अहम रही।

पादशाह बेगम की उपाधि और सत्ता में बढ़ता प्रभाव

औरंगजेब ने रोशनआरा की निष्ठा और योगदान को मान्यता देते हुए उन्हें "पादशाह बेगम" की उपाधि दी। उन्होंने न सिर्फ हरम की प्रमुख की भूमिका निभाई, बल्कि मुगल साम्राज्य में एक शक्तिशाली प्रशासनिक अधिकारी के रूप में भी उभरीं।

सेना में उच्च पद मिलने के साथ-साथ, राज्य के कई अहम फैसले भी उनकी देखरेख में लिए जाने लगे। मुगल सल्तनत में महिलाओं को इतनी सत्ता बहुत कम ही मिली थी, और रोशनआरा इसका अपवाद थीं।

सत्ता का अंत: जिस भाई को तख्त दिलाया, उसी ने बेदखल किया

हालांकि रोशनआरा का प्रभाव दिन-ब-दिन बढ़ता गया, लेकिन उनकी निजी ज़िंदगी और कुछ फैसलों ने उन्हें विवादों में डाल दिया। उनके कई प्रेम संबंधों की खबरें और गलत तरीकों से धन संग्रह करने की अफवाहें दरबार तक पहुंचने लगीं।

1662 में, जब औरंगजेब गंभीर रूप से बीमार पड़ा, तो रोशनआरा ने सत्ता अपने हाथ में लेनी शुरू कर दी। लेकिन जब औरंगजेब ठीक हुआ और दिल्ली लौटा, तो उसने अपनी बहन की बढ़ती महत्वाकांक्षा और भ्रष्टाचार पर नाराजगी जताई।

1668 में, औरंगजेब ने उन्हें दरबार से बेदखल कर दिया और दिल्ली के बाहर एक महल में एकांत जीवन बिताने का आदेश दिया।

रोशनआरा का अंतिम अध्याय

अपने अंतिम वर्षों में, रोशनआरा दरबार और राजनीति से पूरी तरह अलग-थलग हो गईं। 14 सितंबर 1671 को, 54 वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु हो गई। उनका मकबरा आज भी दिल्ली में स्थित रोशनआरा बाग में मौजूद है।

निष्कर्ष

रोशनआरा बेगम मुगल इतिहास की उन गुमनाम नायिकाओं में से एक थीं जिन्होंने सत्ता की बिसात पर कभी राजा की सबसे बड़ी सहयोगी, तो कभी सबसे बड़ी प्रतिद्वंद्वी की भूमिका निभाई। उन्होंने औरंगजेब को बादशाह बनाने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी, लेकिन सत्ता की सच्चाई यही है कि जब कोई और ताकतवर हो जाता है, तो पुराने सहयोगी धीरे-धीरे दरकिनार कर दिए जाते हैं।

आज भी, रोशनआरा का नाम इतिहास में एक चतुर, महत्वाकांक्षी और शक्तिशाली शहजादी के रूप में दर्ज है, जिसने मुगल साम्राज्य की राजनीति को एक नई दिशा दी। - डॉ. मनोज अग्रवाल (सदस्य-जिला पुरातत्व संघ)



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