मुद्राशास्त्री डॉ. मेजर गुप्ता बताते हैं कि मुगल बादशाह अकबर ने बुरहानपुर असीरगढ़ की फतह के जश्न में टकसाल बनवाया था। असीर के सोने के सिक्कों पर बाज का चित्र व जरब असीर लिखवाया। टकसाल का पहला सिक्का चांदी का 900 मिली ग्राम वजन का बना। मुगलकाल में ये नगर एक प्रमुख केंद्र हुआ करता था। बुरहानपुर में टकसाल कहां था इसको लेकर अब तक एक राय नहीं है। कुछ का कहना है बहादरपुर में टकसाल थी, लेकिन अधिकांश का मानना है लोधीपुरा में बड़ी गुरुद्वारा संगत के पास टकसाल थी, क्योंकि उस मोहल्ले को आज भी टकसाल के नाम से ही जाना जाता है। मुगलों से लेकर सिंधिया तक सिक्कों का एक ही रूप बना रहा। सिर्फ राजा का नाम व तारीख बदलती रही। शाह आलम के समय सिक्के पर दारूसुरूर लिखा हुआ मिलता है।
अलग-अलग नामों से निकाले सिक्के
मुगलों के समय बुरहानपुर टकसाल के सिक्के बहुत ही खूबसूरत होते थे। विशेष पर्व राजा का जन्मदिन, नगर में प्रथम प्रवेश, जंग में फतह के मौके पर नए सिक्के तैयार किए जाते थे। बादशाह जहांगीर, औरंगजेब, शाह आलम सहित अन्य मुगल बादशाहों ने निसार सिक्के निकाले। जहांगीर ने विशेष सिक्का नूर अफसान भी निकाला। औरंगजेब ने बुरहानपुर पर (फकीरा का नगर) नाम से भी सिक्के तैयार कराए। टकसाल में तैयार होने वाले सिक्कों पर बादशाहों के नाम और तारीख सहित बुरहानपुर और दारूसुरूर लिखा हुआ मिलता है। टकसाल में सोने, चांदी और तांबे के सिक्के भी शामिल हैं। निसार सिक्का मुगल शासकों ने निकाला। निसार का अर्थ न्योछावर होता है। ये किसी भी शुभ अवसर जैसे राजा के नगर आगमन, फतह, जन्मदिन पर न्योछावर कर सिक्कों को गरीबों में बांटा जाता था।
18 बादशाहों ने बुरहानपुर से निकाले सिक्के
मुगल बादशाह अकबर से लेकर शाह आलम द्वितीय तक 22 बादशाहों में से 18 बादशाहों ने बुरहानपुर टकसाल से सोने, चांदी व तांबे के सिक्के तैयार करवाए। 250 सालों तक यहां पर सिक्के बनाए गए। बुरहानपुर में तैयार हुए 250 सिक्के मुद्राशास्त्री डॉ. मेजर एमके गुप्ता के संग्रह हैं। यहां पर दुर्लभ निसार सहित अन्य सिक्के भी मौजूद हैं। ऐतिहासिक शहर बुरहानपुर में आज भी खुदाई के दौरान जमीन से सिक्के के घड़े बाहर निकलते हैं। ताप्ती नदी के किनारे आसपास की खुदाई कर पुरानी वस्तुओं को बाहर निकाला जाता है।
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