बुरहानपुर जी (डॉ मनोज अग्रवाल) -
श्री बालाजी महाराज मंदिर
बुरहानपुर का बालाजी मेला बहुत प्रसिद्ध है । इस मेले की अपनी एक निराली शान है । पवित्र नदी ताप्ती के किनारे लगने वाले इस मेले में दूर दूर से लोग आकर अपने जीवन की साध पूरी करते है । मध्यप्रदेश का " तिरुपति " बुरहानपुर नगर है । यह मेला एकता का प्रतीक बन गया है । हिन्दू - मुस्लिम सभी भक्ति भाव से इस मेले में सम्मिलित होते है ।
तिरुपति यूँ तो मूलरुप से दक्षिणवासियों के इष्टदेवता है । बुरहानपुर में तिरुपति से बालाजी के आने व लाए जाने की एक कहानी है । लगभग चार सौ वर्ष पूर्व संत के सदस्य श्री रत्नाकरजी महाराज थे । इनके पुत्र श्री जयदेव तथा उनके इकलौते पुत्र श्री एकनाथ महाराज तिरुपति के भक्त थे । पीढ़ी दर पीढ़ी तिरुपति बालाजी के दर्शन करने हर वर्ष तिरुपति जाया करते थे । उनकी इस भक्ति से प्रसन्न होकर स्वयं भगवान तिरुपति ने श्री रत्नाकर महाराज को साक्षात दर्शन दिये और अपनी मूर्ति ले जाने तथा उसे स्थापित करने की बात कही , ताकि तिरुपति तक आने की कष्टदायक यात्रासे वे मुक्ति पा सकें । कहते है इनकी पीढ़ी के किसी भी व्यक्ति को तिरुपति जाना वर्जित है ।
कहा यह भी जाता है कि वहाँ जाने की जिसने कोशिश की वह वहाँ तक पहुँच नहीं पाया । श्री रत्नाकर महाराज की पीढ़ी के अंतिम संत श्री एकनाथ महाराज बालाजी की पंच धातु की मूर्ति को लेकर महाराष्ट्र क धुलिया परगना , गुजरात से सुरत होते हुए बुरहानपुर पहुँचे । यहाँ पर पहुँचने पर भगवान बालाजी से उनका साक्षात्कार हुआ और श्री बालाजी ने श्री एकनाथ महाराज से अपना मन्दिर उस स्थान पर जहाँ आज मन्दिर है स्थापित करने की इच्छा व्यक्त की ।
इस समय मुगल बादशाह शाहजहां का शासनकाल था किन्तु इसकी उदारता ने बालाजी मन्दिर स्थापित करने की न केवल अनुमति दी , बल्कि अपना बनाबनाया दरबार भी दे दिया , ताकि उसमें बालाजी भगवान की स्थापना की जा सकें । उसी स्थान पर आज भी बालाजी मन्दिर विद्यमान है । महाराज पेठ में स्थापित इस मंदिर में आज भी मुगल शैली की बनावट देखी जा सकती है ।
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