भगवान विष्णु का ही स्वरूप है सत्यनाराण
सत्यनारायण भगवान, वैष्णव परंपरा में भगवान विष्णु का ही सत्य स्वरूप है. भगवान विष्णु की कई तरह की छवियां प्रचलित हैं. इनमें एक सबसे प्रसिद्ध है, जिसमें वह क्षीरसागर में शेषनाग की शैय्या पर आराम की मुद्रा में हैं. देवी लक्ष्मी उनके पैरों के पास बैठी हुई हैं. उनकी नाभि से कमल निकल रहा है और ब्रह्मा जी उस कमल पर विराजमान हैं. यह चित्र संसार के निर्माण का चित्रण माना जाता है.
इस तरह की है सत्यनारायण भगवान की मुद्रा
इसके बाद भगवान विष्णु का एक और स्वरूप सामने आता है. इसमें वह कमल पुष्प पर खड़े हैं. उनके चार हाथ हैं. दो हाथ कंधों से ऊपर उठे हुए हैं, जिसमें बाएं हाथ में शंख है, दाहिने हाथ में चक्र, नीचे के दाहिने हाथ में गदा है और बाएं हाथ में कमल. यही कमल वाला हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में भी है. भगवान विष्णु के इस स्वरूप को चतुर्भुज स्वरूप और इसी रूप के संपूर्ण सत्य होने के कारण इसे ही सत्यनारायण कहते हैं.
इसलिए जुड़ा नारायण के आगे सत्य
नारायण के आगे सत्य इसलिए जोड़ा गया, क्योंकि इस स्वरूप में दया, ममता, वात्सल्य, प्रेम के साथ दंड, क्रोध, युद्ध और विनाश ये आठों भाव समाहित हैं. ये स्वरूप बताता है कि ईश्वर जिसे नारायण कहा गया है वह सदैव धर्म की रक्षा के लिए तत्पर है और अधर्मियों के नाश से पीछे नहीं हटेगा. यदि वह गदा से दर्द देगा तो कमल पुष्प से मीठी सहलाहट भी देगा. वह साधु (सज्जन) समाज को प्रेम करेगा तो पापियों का चक्र से विनाश करेगा. भक्तों और मानवता से प्रेम करने वालों के लिए उसके हृदय में विशेष करुणा है. इसी कारण उन्हें करुणानिधि कहते हैं. यही स्वरूप भगवान विष्णु का सत्यनारायण स्वरूप है.
अब सवाल उठता है कि इस स्वरूप को देखा किसने? जाना किसने? इसे लेकर स्कंद पुराण में कथा है. देवर्षि नारद भगवान विष्णु से हमेशा संसार के विषय में सत्संग करते थे. तब उन्होंने एक दिन पूछा कि सत्य क्या है? वास्तव में मैं जो देख रहा हूं, यह सब क्या है? क्या ये सदैव रहेगा? अगर नहीं रहेगा तो कब नष्ट हो जाएगा? फिर उन्होंने पूछा कि मैं कौन हूं? और आखिरी में पूछा आप कौन हैं?
नारद मुनि ने किया था प्रश्न
यह प्रश्न सुनकर भगवान मुस्कराए और फिर आंखें बंद करके ऊं का उच्चारण किया. यह ध्वनि सुनकर नारद को शांति मिली और वे प्रकाश से भर उठे. इसी प्रकाश में उन्हें चारभुजा धारी रूप के दर्शन हुए, लेकिन इस आकृति का कोई चेहरा नहीं था. जब उन्होंने भगवान विष्णु से बार-बार प्रार्थना की तो तब इसी चतुर्भुज स्वरूप ने उन्हें सामान्य अवस्था में सामने आकर दर्शन दिए. इस स्वरूप ने कहा कि यह तुम्हारे आखिरी प्रश्न का उत्तर, यह मेरा स्वरूप है. अब ध्यान से देखो, खुद में देखो, यही तुम्हारा स्वरूप है. तब नारद मुनि ने देखा कि सारा ब्रह्मांड, पृथ्वी, आकाश, नक्षत्र, ग्रह और तारामंडल सब कुछ भगवान विष्णु के हृदय में हैं. खुद वह भी उनके हृदय में बैठे उन्हें ही देख रहे हैं. अपने हृदय में भी उन्हें यही दृश्य दिखा. तब उन्हें सत्य समझ में आया और उन्होंने इस स्वरूप को सत्यनारायण स्वरूप कहा.
स्कंदपुराण के रेवाखंड में संकलित है कथा
स्कंदपुराण के ही रेवाखंड में यह दृश्य बहुत संक्षेप में संकलित है. विष्णुपुराण और ब्रह्मपुराण में इस घटना का वर्णन विस्तार से किया गया है. भागवत कथा में भी इसे समाहित किया गया है. श्रीसत्यनारायण की कथा स्कंदपुराण के रेवाखंड में ही संकलित है. दरअसल यह कथा सीधे-सीधे सत्यनारायण भगवान की नहीं है, बल्कि उनकी कथा कहने का महत्वसुनकर फल पाए लोगों की कथा है. इसमें सूत जी पांच पात्रों शतानंद ब्राह्मण, लकड़हारा, राजा उल्कामुख, साधु नाम के बनिये और राजा तुंगध्वज की कहानी संकलित है.
यह है भगवान सत्यनारायण की कथा
कथा कि शुरुआत ही यहां से होती है कि एक बार शौनक महर्षि सूत से पूछते हैं कि इंसान को इच्छा पूर्ति और उसके बाद स्वर्ग का सुख पाने के लिए अपने जीते-जी क्या करना चाहिए. यहां पर जवाब में सूत जी भी शौनक ऋषि को एक कहानी सुनाते हैं. महर्षि सूत, ऋषि शौनक को बताते हैं कि ऐसा ही सवाल एक बार महर्षि नारद ने भगवान् विष्णु से किया था. उसके जवाब में नारद जी भगवान विष्णु जी ने एक कथा सुनाई थी. सूत ऋषि, शौनक जी से जिस कथा की बात कर रहे हैं, दरअसल वह नारद जी द्वारा भगवान विष्णु से पूछे गए सवाल ही थे, जिसमें उन्हें भगवान के इस स्वरूप के दर्शन हुए थे.