इस लेख के माध्यम से आज हम जानेंगे कि भगवान शिव को नटराज अवतार धारण करने की क्या आवश्यकता पड़ी।
शिव पुराण के अनुसार
एक बार की बात है मां पार्वती के कठिन तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनसे वर मांगने के लिए कहा. पार्वती जी ने कहा कि देवताओं के कार्य सिद्ध करने के लिए आप मेरा पाणिग्रहण करें. आप मेरे पिता के पास भिक्षु के रूप में जाइए और अपना यश प्रकट कर मुझे उनसे मांग लीजिए. माता पार्वती की बात सुनकर भगवान शिव कहते हैं तथास्तु.
एक दिन राजा हिमालय की पत्नी और पार्वती जी की मां मेना और पार्वती जी आंगन में बैठे हुए थे. राजा हिमालय गंगा स्नान करने गए थे. तभी वहां पर भगवान शिव अपना रूप बदलकर पहुंच गए. पर उन्होंने मनोहर गीत गाते हुए नृत्य की प्रस्तुति दी. जिससे प्रसन्न होकर रानी मेना ने रत्नों से भरा सोने का पात्र रूप बदले शिव जी को दिया. लेकिन भगवान शिव ने उसे लेने से इनकार कर दिया और भिक्षा के रूप में माता पार्वती को मांग लिया. यह सुनकर मेना क्रोधित हुईं और भगवान शिव को महल से बाहर जाने के लिए कहा.
तभी भगवान शिव ने पर्वतराज हिमालय और मेना को अपना प्रभाव दिखाया. उन्हें भगवान शिव कभी विष्णु रूप में दिखते, कभी ब्रह्मा रूप में दिखते और कभी सूर्यरूप में दिखाई देते.
फिर वह परम तेजस्वी रुद्ररूप धारण कर माता पार्वती के साथ मनोहर परिहास करते हुए दिखाई दिए. उन्होंने पर्वतराज हिमालय से भिक्षा में पार्वती को ही मांगा और अंतर्ध्यान हो गए.
राजा हिमालय और मेना यह सब देख अचंभित हो गए और उन्होंने कहा कि भगवान शिव को हमें अपनी कन्या पार्वती दे देना चाहिए. इस तरह माता पार्वती की मनोकामना पूर्ण करने के लिए भगवान शिव ने नटराज अवतार धारण किया.
दक्षिण भारत में प्रचलित कथा के अनुसार
तारगम नाम के एक निर्जन स्थान पर कुछ साधु निवास करते थे. जिनको अपनी विद्या पर बहुत अभियान था. वहां पर रहने वाले लोगों को तुच्छ समझ कर उन्हें काफी परेशान करते थे. सबसे त्रस्ताकर और ऋषियों का अभिमान चूर करने के लिए वहां के लोगों ने भगवान शिव की आराधना की. प्रसन्न होकर भगवान शिव ऋषियों के समक्ष अपना रूप बदल कर पहुचें लेकिन उन्होंने भगवान शिव को भी तुच्छ समझ कर सम्मान नहीं किया. उल्टा वाराह को उन पर आक्रमण करने के लिए भेज दिया. तब भगवान शिव ने अपनी अक अंगुली से उसकी खाल उधेड़ कर वस्त्र धारण कर लिए. यह देख ऋषियों का गुस्सा सातवें आसमान पर था. उन्होंने एक भयंकर विष वाले सर्प को भगवान शिव के ऊपर फेंका. लेकिन शिव जी ने उसे भी कंठाहार बना लिया. तभी ऋषियों ने अपनी मंत्र शक्ति से एक राक्षस प्रकट किया जो तेज़ गर्जना कर भगवान शिव की तरफ दौड़ा लेकिन भगवान शिव ने उसे भी अपने पैरों तले रौंध दिया और उसके शव पर खड़े होकर नृत्य करने लगे. इस प्रकार भगवान शिव ने नटराज अवतार लिया.