कैसे हुई थी गणेशोत्सव की शुरुआत ? किसने किया आरम्भ ?


श्री गणेशोत्सव का इतिहास
श्री गणेश उत्सव का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। गणेश जी को विघ्नहर्ता माना जाता है। इसका पौराणिक एवं आध्यात्मिक महत्व है। इस उत्सव का प्रारंभ छत्रपति शिवाजी महाराज जी के द्वारा पुणे में हुआ था। शिवाजी महाराज ने गणेशोत्सव का प्रचलन बड़ी उमंग एवं उत्साह के साथ किया था, उन्होंने इस महोत्सव के माध्यम से लोगों में जनजाग्रति का संचार किया।

इसके पश्चात पेशवाओं ने भी गणेशोत्सव के क्रम को आगे बढ़ाया। गणेश जी उनके कुलदेवता थे इसलिए वे भी अत्यंत उत्साह के साथ गणेश पूजन करते थे। पेशवाओं के बाद यह उत्सव कमजोर पड़ गया और केवल मंदिरों और राजपरिवारों में ही सिमट गया। इसके पश्चात 1892 में भाऊसाहब लक्ष्मण जबाले ने सार्वजनिक गणेशोत्सव प्रारंभ किया।

स्वतंत्रता के पुरोधा लोकमान्य तिलक, सार्वजनिक गणेशोत्सव की परंपरा से अत्यंत प्रभावित हुए और 1893 में स्वतंत्रता का दीप प्रज्ज्वलित करने वाली पत्रिका 'केसरी' में इसे स्थान दिया। उन्होंने अपनी पत्रिका 'केसरी' के कार्यालय में इसकी स्थापना की और लोगों से आग्रह किया कि सभी इनकी पूजा-आराधना करें, ताकि जीवन, समाजऔर राष्ट्र में विघ्नों का नाश हो।

उन्होंने श्री गणेश जी को जन-जन का भगवान कहकर संबोधन किया। लोगों ने बड़े उत्साह के साथ उसे स्वीकार किया, इसके बाद गणेश उत्सव जन-आंदोलन का माध्यम बना। उन्होंने इस उत्सव को जन-जन से जोड़कर स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु जनचेतना जाग्रति का माध्यम बनाया और उसमें सफल भी हुए। आज भी संपूर्ण महाराष्ट्र इस उत्सव का केंद्र बिन्दु है, परंतु देश के प्रत्येक भाग में भी अब यह उत्सव जन-जन को जोड़ता है।

गणेश चतुर्थी मनाने के पीछे एक मान्यता ये भी -

गणेश चतुर्थी मनाने को लेकर कई पौराणिक कथाएं हैं, उनमें से एक कथा के अुसार एक बार महर्षि वेदव्यास ने महाभारत की रचना के लिए गणेश जी को लिपिबद्ध करने के लिए कहा. जिस पर गणेश जी ने कहा मैं अपनी कलम से जब लिखना प्रारंभ करूंगा तो बीच में कही भी रुकूंगा नहीं और यदि कलम रुक गई तो लिखना छोड़ दूंगा.

जिसके बाद गणेशजी ने महाभारत को लिपिबद्ध करना प्रारंभ किया और वह 10 दिन बाद अनंत चतुर्दशी के दिन यह कार्य समाप्त कर उठे. इन 10 दिनों तक गणेश जी एक ही मुद्रा में बैठकर महाभारत को लिपिबद्ध करते रहे, इस कारण यह उत्सव 10 दिनों तक मनाया जाता है.

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