🔥 पीसा की मीनार से भी ज्यादा झुका है काशी का रत्नेश्वर महादेव मंदिर, काशी. पीसा विश्व धरोहर फिर रत्नेश्वर महादेव मंदिर क्यों नही ?
💥 इटली की लीनिंग टावर ऑफ पीसा वास्तुशिल्प का अदभुत नमूना है। नींव से यह 4 डिग्री झुकी है। इसकी ऊंचाई 54 मीटर है। पीसा की मीनार अपने झुकने की वजह से ही दुनिया भर में मशहूर है, और वल्र्ड हेरिटेज में शामिल है। पीसा की तरह एक ओर झुके हुए रत्नेश्वर महादेव मंदिर पीसा की मीनार से यह ज्यादा झुकी हुई है, बावजूद इसके यह विश्व धरोहर की सूची में शामिल नहीं है। जबकि मंदिर पीसा की मीनार से भी खूबसूरत वास्तुशिल्प का नमूना है। यह अपनी नींव से 9 डिग्री झुकी हुई है। इसकी ऊंचाई 40 फीट है। लेकिन इसकी इस विशिष्टता से देश के बहुत कम लोग परिचित हैं।
💥 मंदिर 9 डिग्री तिरछा है इसलिए इस मंदिर को झुकाव मंदिर भी कहा जाता है. लोग इसे काशी करवट बताते हैं। हालांकि काशी करवट मंदिर काशी विश्वनाथ मंदिर के पास नेपाली खपड़ा इलाके में है। वाराणसी में सबसे अधिक फोटो खिंचवाने वाले मंदिरों में से एक है। मंदिर काफी पीछे की ओर (उत्तर-पश्चिम) की ओर झुकता है, और इसका गर्भगृह आमतौर पर गर्मियों के दौरान कुछ महीनों को छोड़कर, वर्ष के अधिकांश समय में पानी के नीचे होता है।
यह मंदिर सैकड़ों सालों से एक तरफ काफी झुका हुआ है। इसके झुके होने को लेकर कई तरह की दंत कथाएं प्रचलित हैं। फिर भी यह रहस्य ही है कि पत्थरों से बना वजनी मंदिर टेढ़ा होकर भी आखिरकार सैकड़ों सालों से खड़ा कैसे है। गंगा घाट पर जहां सारे मंदिर घाट के ऊपर बने हैं वहीं यह अकेला ऐसा मंदिर है जो घाट के नीचे बना है। इस वजह से यह छह से आठ महीनों तक पानी में डूबा रहता है। गुजरात शैली में बना यह मंदिर करीब 40 फीट ऊंचा है। मंदिर का ढांचा काफी भारी भरकम है। यह मंदिर नीचे की ओर बना है, महीनों पानी में डूब जाता है। बाढ़ में गंगा का पानी मंदिर के शिखर तक पहुंच जाता है। इसी कारण मंदिर बहुत पहले ध्वस्त हो जाना चाहिए पर मंदिर सैकड़ों सालों से खड़ा है. फिर यह रहस्य ही है कि पत्थरों से बना वजनी मंदिर टेढ़ा होकर भी आखिरकार सैकड़ों सालों से खड़ा कैसे है। पानी उतरने के बाद मंदिर का पूरा गर्भगृह बालू और सिल्ट से भरा जाता है। इस वजह से बाकी मंदिरों की तरह यहां पूजा नहीं होती। स्थानीय पुजारी बताते हैं दो-तीन महीने में कुछ ही दिन साफ सफाई के बाद यहां पूजा होती है।
☘️ रीजनल आर्कियोलॉजी ऑफिसर के मुताबिक यह 18वीं शताब्दी में बनकर तैयार हुआ था।
☘️ घाट के आसपास बसे पुरोहितों का मानना है कि रत्नेश्वर महादेव की स्थापना 15वीं सदी में हुई थी।
☘️ कुछ सूत्रों का दावा है कि इसे 19वीं शताब्दी में ग्वालियर की रानी बैज बाई ने बनवाया था।
☘️ राजस्व अभिलेखों के अनुसार, इसका निर्माण १८२५ से १८३० तक किया गया था।
☘️ एक दावे के अनुसार निर्माण अमेठी शाही परिवार द्वारा १८५७ में किया गया था।
☘️ जेम्स प्रिंसेप जो १८२० से १८३० तक बनारस टकसाल में एक परख गुरु थे उसने चित्रों की एक श्रृंखला बनाई, जिनमें से एक में रत्नेश्वर महादेव मंदिर भी शामिल है। उन्होंने टिप्पणी की कि जब मंदिर का प्रवेश द्वार पानी के नीचे था, पुजारी पूजा करने के लिए पानी में गोता लगाते थे।
💥 मंदिर टेढ़ा होने के कारण से जुड़ी पांच कहानियां है
☘️ 1. अहिल्या बाई का श्राप
अहिल्या बाई होलकर शहर में मंदिर और कुण्डों निर्माण करा रही थीं। उसी समय रानी की दासी रत्ना बाई ने भी मणिकर्णिका कुण्ड के समीप शिव मंदिर निर्माण कराने की इच्छा जताई। निर्माण के लिए उसने अहिल्या बाई से पैसे उधार लिए थे। अहिल्या बाई मंदिर देख प्रसन्न थीं, लेकिन उन्होंने रत्ना बाई से कहा था कि वह इस मंदिर को अपना नाम न दे। दासी ने उनकी बात नहीं मानी और मंदिर का नाम रत्नेश्वर महादेव रखा। इस पर अहिल्या बाई नाराज़ हो गईं और श्राप दिया कि इस मंदिर में बहुत कम ही दर्शन-पूजन हो पाएगी। तभी मंदिर टेढ़ा हो गया और साल में ज्यादातर समय गंगा में डूबा रहता है।
☘️ 2. संत के क्रोध ने किया
इस मंदिर का निर्माण किसी राजा ने करवाया था। 18वीं शताब्दी के आस पास कोई महान संत इस मंदिर पर साधना किया करते थे। संत ने राजा से मंदिर के रखरखाव और पूजन करने की जिम्मेदारी मांगी थी। राजा ने संत को मंदिर नहीं दिया, जिससे क्रोधित महात्मा ने श्राप दिया कि - जाओ यह मंदिर कभी पूजा करने लायक नहीं रहेगा, और मंदिर टेढ़ा हो गया।
☘️ 3. पंडों को मिला श्राप
यहां कभी एक महंत पूजापाठ करते थे। उन्हें यहाँ के पंडे तंग किया करते थे, जिससे वे क्रोधित होकर श्राप देकर चले गए। तब से आज तक इस मंदिर की पूजा बमुश्किल साल में केवल 4 महीने ही हो पाती है। बाकि 8 महीने मां गंगा ही अभिषेक करती हैं या बाढ़ की मिट्टी गर्भ गृह में पड़ी रहती है।
☘️ 4. मां का कर्ज नहीं उतरा जा सकता
15 और 16वीं शताब्दी के बीच कई राजा-रानियां काशी वास के लिए आए। उनमें से एक थे मान सिंह। उनका सेवक (नाम का कहीं उल्लेख नहीं है) भी अपनी मां रत्नाबाई को लेकर काशी आया। वह अपनी मां के दूध का कर्ज उतारना चाहता था, जिसके लिए उसने शिव मंदिर का निर्माण करवाया। निर्माण के लिए उसने देश के कई हिस्सों से शिल्पकारों को बुलावाया। बेटा दूध का कर्ज उतारना चाहता है इस बात से मां की भावनाओं को ठेस लगी। जब बेटे ने मां से कर्ज की बात कहते हुए मंदिर में दर्शन करने को कहा तो वह बाहर से ही प्रणाम कर चली गई। बेटे ने रोककर कहा, मां अंदर दर्शन नहीं करोगी क्या? इस पर मां ने कहा कि कैसे करूं यह मंदिर तो सही बना ही नहीं। बेटे ने जैसे ही पलट कर देखा, वैसे ही मंदिर एक तरफ धंस गया और टेढ़ा हो गया।
☘️ 5. अमेठी राज परिवार ने निर्माण करवाया
अमेठी राज परिवार ने 1857 में मंदिर का ढांचा खड़ा किया था, तभी से मंदिर टेढ़ा है। इसे जयपुर के शिल्पकारों ने बनाया था। मंदिर का आकर दुर्गा मंदिर की तरह था, इसलिए शिखर गुम्बदों पर शेर बना है। विष्णु अवतार और कृष्ण लीलाएं बनी है।
💥 अंग्रेजों ने भी मंदिर के टेढ़ा होने के पीछे काफी रिसर्च की थी। कई दिनों तक अंग्रेज विशेषज्ञों की टीम ने दौरा भी किया था। पर मंदिर टेढ़ा होने का कारण ना जान सके वह अभी भी रहस्य है
💥 1860 के दशक की तस्वीरें इमारत को झुकी हुई नहीं दिखाती हैं। आधुनिक तस्वीरें लगभग नौ डिग्री का झुकाव दिखाती हैं इमारत संभवतः झुकी हुई है क्योंकि इसे झुकाव के लिए डिज़ाइन किया गया था. २०१५ में बिजली गिरने से शिखर के कुछ तत्वों को मामूली नुकसान हुआ ।
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