डेविड अंकल : व्यक्ति एक रूप अनेक.... कॉमेडियन, चरित्र,विलेन, वेट लिफ्टर, एंकर, कमेंट्रेटर भी थे डेविड

डेविड की कब्र पर लगे पत्थर पर उनके जन्म की तारीख लिखी है जो है 21 जून 1908 है।
डेविड के पिता का नाम अब्राहम था और उनकी माता का नाम था दीना चेहुलकर। डेविड जब मात्र 15-16 साल के थे तब ही उनके पिता अब्राहम की मृत्यु हो गई थी। ऐसे में बड़े भाईयों ने डेविड की परवरिश की थी

मुंबई के ही विल्सन कॉलेज से इन्होंने बीए एलएलबी किया था। डेविड तो चाहते थे कि ये स्पोर्ट्स में ही अपना करियर बनाएं, लेकिन अपने बड़े भाई शेलोम के कहने पर इन्होंने एलएलबी किया था।

मुंबई के ठाणे में एक युहदी परिवार में जन्मे डेविड साहब वेट लिफ्टिंग के बहुत अच्छे खिलाड़ी थे। इस खेल में उन्होंने कई टूर्नामेंट जीते,  पर वे यह समझ गए थे कि वेट लिफ्टिंग से जीवनयापन नही होने वाला है तो उन्होंने कानून की पढ़ाई की पर जब वकालत में भी कई महीने कुछ कमाई नही हुई तो उन्होंने अपने एक दोस्त के कहने पर फिल्मों में काम करना स्वीकार कर लिया।
1937 में बनी फिल्म 'जंबो' उनकी पहली फ़िल्म थी, जिसमें उन्होंने एक बूढ़े प्रोफेसर को किरदार निभाया था। उसके बाद उन्होंने अपनी जिंदगी में लगभग 110 फिल्मों में काम किया पर ज्यादातर फिल्मों में उन्होंने बूढ़े व्यक्ति का ही रोल किया। इसीलिए वे फ़िल्म इंडस्ट्री में डेविड अंकल के नाम से प्रसिद्ध हो गए थे। 

फ़िल्म 'नया संसार' ने उन्हें सिने जगत में पहचान दिलाई।  फ़िल्म 'द्रौपदी' में वे शकुनि के रूप में खलनायकी करते नजर आये।
1954 में प्रदर्शित फ़िल्म 'बूट पालिश' उनके जीवन का मिल का पत्थर साबित हुई।  इस फ़िल्म ने उन्हें फ़िल्म जगत में पूर्ण रूप से स्थापित कर दिया। इसमें उन्होंने गरीब बच्चों को प्यार करने वाले एक दयालु जॉन चाचा का किरदार निभाया था। इसी फिल्म ने उन्होंने पहली बार श्रेष्ठ सह अभिनेता का  फ़िल्म फ़ेयर पुरुस्कार दिलवाया था।  इस फ़िल्म में बहुत ही अच्छा गाना है- "नन्हें मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है....'' । यह गाना  बहुत ही आशावादी और सकारात्मक सोच लिए हुए है। इस गाने के लेखक शैलेन्द्र, संगीतकार शंकर जयकिशन,  गायक और गायिका रफी साहब और आशा ताई, डेविड साहब और बच्चे जिन्होंने अभिनय किया है।

महज़ पांच फीट तीन इंच की हाइट वाले डेविड अंकल ने फिल्मों में कॉमेडी की, विलेनी की और कैरेक्टर आर्टिस्ट की हैसियत से भी काम किया। और अपने काम से ये हरदिल अजीज़ बन गए।

गोलमाल, चुपके चुपके, बातों बातों में, खट्टा मीठा, चुपके चुपके आदि कई हिट फिल्मों में उन्होंने शानदार अभिनय किया था।
बहुत अच्छे अभिनेता होने के साथ-साथ डेविड साहब को खेलों से बहुत लगाव था। कसरत करने का उन्हें बहुत शौक था। वे 30 साल तक महाराष्ट्र वेट लिफ्टिंग संघ के अध्यक्ष रहे। 1952 में हेलीसिंकी में हुए ओलंपिक में वे वेट लिफ्टिंग इवेंट्स के रेफरी के रूप में शामिल हुए थे। उन्होंने कई मैचों की कमेंट्री भी की थी। 

एक वक्त पर डेविड की एंकरिंग भारत की इलीट क्लास में बेहद पसंद की जाती थी और डेविड केवल फिल्मफेयर ही नहीं बल्कि और भी कई सरकारी और गैर सरकारी कार्यक्रमों की एंकरिंग भी किया करते थे। डेविड को एंकरिंग करने के लिए विशेषतौर पर बुलाया जाता था।

एक बार तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू जी ने कहा था, "कोई भी कार्यक्रम डेविड की स्पीच के बिना अधूरा रहता है।"

साल 1969 में भारत सरकार ने भी फिल्म क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया था।

अपने जीवन के अंतिम समय वे फिल्मों से दूर हो गए थे।  वे अपनी भतीजी के पास कनाडा चले गए थे । वही 2 जनवरी 1982 को ह्रदयाघात से उनका स्वर्गवास हो गया। कनाडा में ही उनको दफनाया गया। उनकी कब्र पर ये पंक्तियां अंकित की गईं:-

Here's a man who smiled through his tears and laughed in the midst of a sigh . He mingled his youth with advancing years and was happy to live or die.

 

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