जीवन के अंतिम क्षण तक संघ के स्वयं सेवकत्व का पालन करने वाले, हब्बा कादल क्षेत्र में मुस्लिमों के बीच लाला पश्तो भाषा में बड़ा भाई के नाम से प्रसिद्द, प्रखर राष्ट्रवादी, कश्मीर घाटी के प्रमुख अधिवक्ता, समाजसेवी, भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष, निर्धनों और असहायों के मसीहा और कश्मीरी हिन्दुओं के पक्ष में सदैव शेर की तरह दहाड़ने वाले.
बलिदान पर्व - 14 सितम्बर सन 1989 ई. कश्मीर.
जब पाकिस्तान में बैठे अपने आकाओं के इशारों पर आतंकवादियों ने अपना खूनी खेल कश्मीर घाटी में शुरू किया तो 14 सितम्बर 1989 को लाखों कश्मीरी हिन्दुओं के बीच उनकी गोलियों का सबसे पहला निशाना बने थे टीकालाल, क्योंकि दहशतगर्द इस बात को भलीभांति जानते थे कि इस व्यक्ति के रहते वो कश्मीरी हिन्दुओं के मन में खौफ पैदा नहीं कर पायेंगे.
कोई भी ताक़त कभी भी उन्हें कश्मीरियत और भारतीयता को अलग अलग देखने को बाध्य नहीं कर सकी. अच्छी खासी वकालत के बाबजूद जीवन भर वो तंगहाली में ही रहे और उनकी पत्नी श्रीमती सरला देवी को घर को चलाने में बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ा क्योंकि उन्होंने जो कुछ भी कमाया, जरुरतमंदों, निर्धनों, असहायों, विधवाओं पर लुटा दिया.
वो विधवाओं को घर चलाने के लिए मासिक मदद देते थे, गरीब बच्चों की फीस देते थे, निर्धन लड़कियों की शादी कराते थे और पारिवारिक विवादों को आपस में ही निपटवाने में लोगों की भरसक मदद करते थे और इस तरह स्थानीय लोगों द्वारा दिए गए नाम 'लाला' की सार्थकता को सिद्ध करते थे.
आतंकवाद के विरुद्ध उनका मुखर स्वर जन जन की आवाज बना जिसे हिन्दुओं के अलावा, प्रारम्भिक दौर में मुस्लिमों का भी सहयोग मिला और जिसे आतंकी बर्दाश्त न कर सके. लाल चौक पर उनकी हुंकार आतंकियों के कानों में तीर की तरह चुभती थी पर जीवन भर मूल्यों की राजनीति करने वाले टीकालाल जी को सच और साहस के मार्ग से कोई ताक़त हटा नहीं पायी.
यूँ तो इंसान मरता ही है पर टीकालाल जी मर कर भी अमर हैं, उन लाखों लाख कश्मीरी हिन्दुओं के हृदयों में जो उनकी मृत्यु के बाद अनाथ हो गए और जिन्हें उसके बाद अपने घरों को छोड़ कर भागना पड़ा.
जमाना बीत गया पर कोई भी उनकी जगह नहीं ले पाया और ना कभी ले पायेगा क्योंकि उत्साह, उर्जा, समर्पण, प्रतिबद्धता, करुणा, दया, त्याग, साहस, वीरता और बलिदानी भावना का सम्मिश्रण एक ही व्यक्ति में मिलना लगभग असंभव ही होता है.
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