कौन है भगवान अयप्पा ? क्या महत्व है शबरी माला मंदिर का ? : आईये जानते हैं

01. मलयालम में 'सबरीमला' का अर्थ होता है, पर्वत। सबरी पर्वत पर घने वन हैं। 18 पहाड़ियों को जंगलों से घिरे स्थान पर यह मंदिर है। यह स्थान सह्याद्रि पर्वतमाला से घिरे हुए पथनाथिटा जिले में स्थित है। पंपा से सबरीमला तक पैदल यात्रा करनी पड़ती है। कुछ लोग इसे रामभक्त शबरी के नाम से जोड़कर भी देखते हैं, क्योंकि पंपा सरोवर के पास ही मातंग ऋषि का आश्रम था जहां पर शबरी की कुटिया थी।  

02. यह भी माना जाता है कि परशुरामजी ने अयप्पन पूजा के लिए सबरीमला में मूर्ति स्थापित की थी।

03. भगवान अयप्पा के पिता शिव और माता मोहिनी हैं। विष्णु का मोहिनी रूप देखकर भगवान शिव का वीर्यपात हो गया था। उनके वीर्य को पारद कहा गया और उनके वीर्य से ही बाद में सस्तव नामक पुत्र का जन्म का हुआ जिन्हें दक्षिण भारत में अयप्पा कहा गया। 

04. शिव और विष्णु से उत्पन होने के कारण उनको 'हरिहरपुत्र' भी कहा जाता है। इनके अलावा भगवान अयप्पा को अयप्पन, शास्ता, मणिकांता नाम से भी जाना जाता है।

05. कुछ पुराणों में अयप्पा स्वामी को शास्ता का अवतार माना जाता है। कम्बन रामायण, महाभागवत के अष्टम स्कंध और स्कन्दपुराण के असुरकाण्ड में जिस शिशु शास्ता का उल्लेख है, अयप्पन उसी के अवतार माने जाते हैं। कहते हैं, शास्ता का जन्म मोहिनी और शिव के समागम से हुआ था।

06. अयप्पा स्वामी के दक्षिण भारत में कई मंदिर हैं उन्हीं में से एक प्रमुख मंदिर है सबरीमाला। इसे दक्षिण का तीर्थस्थल भी कहा जाता है। मान्यता है कि सबरीमाला मंदिर का निर्माण हजारों साल पहले राजा राजशेखर ने कराया था। 

07. धार्मिक कथा के मुताबिक समुद्र मंथन के दौरान भोलेनाथ भगवान विष्णु के मोहिनी रूप पर मोहित हो गए थे और इसी के प्रभाव से एक बच्चे का जन्म हुआ जिसे उन्होंने पंपा नदी के तट पर छोड़ दिया। इस दौरान राजा राजशेखरा ने उन्हें 12 सालों तक पाला। 

08. एक बार स्वामी अयप्पा अपनी माता के लिए शेरनी का दूध लाने जंगल गए और वहां पर अयप्पा स्वामी ने महिषासुर की बहन राक्षसी महिषि का भी वध किया था, क्योंकि वह राक्षसी अयप्पा स्वामी से विवाह करना चाहती थी। महिषी के वध के बाद भगवान अयप्पा ने पहाड़ों पर जाकर ध्यान किया था।

09. अय्यप्पा स्वामी के बारे में किंवदंति है कि उनके माता-पिता ने उनकी गर्दन के चारों ओर एक घंटी बांधकर उन्हें छोड़ दिया था। बाद में पंडालम के राजा राजशेखर ने अय्यप्पा स्वामी को पुत्र के रूप में पाला। लेकिन भगवान अय्यप्पा को ये सब अच्छा नहीं लगा और उन्हें वैराग्य प्राप्त हुआ तो वे महल छोड़कर चले गए। 

10. अयप्पा स्वामी के मंदिर के पास मकर संक्रांति की रात घने अंधेरे में रह-रहकर यहां एक ज्योति दिखती है। इस ज्योति के दर्शन के लिए दुनियाभर से करोड़ों श्रद्धालु हर साल आते हैं। बताया जाता है कि जब-जब ये रोशनी दिखती है इसके साथ शोर भी सुनाई देता है। भक्त मानते हैं कि ये देव ज्योति है और भगवान इसे जलाते हैं। मंदिर प्रबंधन के पुजारियों के मुताबिक मकर माह के पहले दिन आकाश में दिखने वाले एक खास तारा मकर ज्योति है। 

11. कहते हैं कि अयप्पा ने शैव और वैष्णवों के बीच एकता कायम की। उन्होंने अपने लक्ष्य को पूरा किया था और सबरीमाल में उन्हें दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हुई थी।

12. अयप्पा स्वामी ब्रह्मचारी और तपस्वी हैं और इसीलिए उनके मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध था। यहां 10 से 50 साल तक की लड़कियां और महिलाएं नहीं प्रवेश कर सकतीं। वृद्ध महिलाएं और बालिकाएं उनके मंदिर में जा सकती थीं। हिन्दुस्तान के लाखों मंदिरों में से अनेक मंदिरों में मान्यता अनुसार कहीं पुरुषों को दर्शन की मनाही है, तो कहीं महिलाओं के बाहर से ही दर्शन की मान्यता है। 

13. मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं तो उसके लिए भक्तों के पास पल्लिकेट्टू अनिवार्य है। पल्लिकेट्टू एक छोटा सा झोलेनुमा कपड़ा होता है जिसमें गुड़, नारियल और चावल इत्यादि प्रसाद का सामान रहता है।

14. इस मंदिर तक पहुंचने के लिए 18 पावन सीढ़ियों को पार करना पड़ता है, जिनके अलग-अलग अर्थ भी बताए गए हैं। पहली पांच सीढ़ियों को मनुष्य की पांच इन्द्रियों से जोड़ा जाता है। इसके बाद वाली 8 सीढ़ियों को मानवीय भावनाओं से जोड़ा जाता है। अगली तीन सीढ़ियों को मानवीय गुण और आखिर दो सीढ़ियों को ज्ञान और अज्ञान का प्रतीक माना जाता है।

15. मंदिर में भगवान अयप्पा के दर्शन करने के लिए पहले भक्तों को 41 दिनों का कठिन व्रत का अनुष्ठान करना पड़ता है जिसे 41 दिन का 'मण्डलम' कहते हैं। यहां वर्ष में तीन बार जाया जा सकता है- विषु (अप्रैल के मघ्य में), मण्डलपूजा (मार्गशीर्ष में) और मलरविलक्कु (मकर संक्रांति में)।

16. धार्मिक मान्यता के अनुसार भक्त तुलसी या रुद्राक्ष की माल धारण करके व्रत रखकर यहां आते हैं तो उनकी सभी तरह की मनोकामना पूर्ण होती है, क्योंकि अयप्पा स्वामी को तुलसी और रुद्राक्ष की माला प्रिय है।

17. अयप्पा स्वामी के दर्शन करने के 2 माह पहले से ही भक्तों को मांस, मछली, मदिरा आदि का त्याग करके ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए 41 दिन का व्रत रखना होता है तभी मंदिर में दर्शन होते हैं। यदि कोई ऐसा नहीं करके दर्शन करता है तो अयप्पा स्वामी उस पर नाराज हो जाते हैं।

18. मंदिर में अयप्पा स्वामी को भोग लगाने के लिए खास तरह का सबरीमाला अरावन पायसम प्रसाद बनाया जाता है। पायसम का निर्माण परंरागत तरीके से किया जाता है।

19. माना जाता है कि 12वीं शताब्दी में मनीकंदन नाम के एक राजकुमार हुए जिन्होंने मंदिर तक पहुंचने का मार्ग खोज निकाला था। ये राजकुमार भगवान अय्यपा के अवतार माने गए। राजकुमार मनीकंदन कई अनुयायियों के साथ मंदिर तक गए थे, जिनमें वावर परिवार के पूर्वज भी शामिल थे।

20. भगवान विष्णु को हरि और शिव को हर कहा जाता है, इसलिए इस आधार पर भगवान अयप्पा को हरिहर के नाम से भी जाना जाता है। 


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