बुरहानपुर - यह बाग शाही किले के सामने ताप्ती नदी के दूसरे किनारे पर स्थित है। यह शाहज़ादा दानियाल की शिकारगाह थी। यह बेगम नूरजहां की भी शिकारगाह थी। इसके बड़े अहाते में एक हौज, एक महल और बारादरी का निर्माण 1612 में नूरजहाँ के लिए प्रांरभ हुआ।
इसकी ड़िजाईन नूरजहाँ के भाई एतेकादखाँ जो उस समय काश्मीर के सूबेदार थे ने भिजवाई थी।एतेकाद खां के लिए बुरहानपुर के प्रसिध्द कमोद के चावल और गंगेरी पान कश्मीर भेजे जाते थे।शाहजहां ने भी बेगम मुमताज के लिए कुछ परिवर्तन करवाये थे। अहाते के बाहर पूर्वी छोर पर पानी का एक बड़ा भंडार था। महल गुल्हारा से यहां तक नहर के द्वारा पानी लाया गया था। महल और बारादरी के बीच में एक नहर बेगम और उनकी सहेलियों के मनोरंजन और खेल के लिए बनवाई गई थी।इसे बागे आलम आरा और बागे जैनाबाद भी कहते थे।
यहां पर शाहजहाँ की प्रेयसी, प्रियतमा, बेगम, मलिका मुमताज महल के देहावसान के बाद उनकी लाश को 6 महीने के लिए बारादरी में रखा गया था।(ASI के अनुसार) दूसरी मान्यता यह है कि मुमताज बेगम का शव पाइन बाग के मदफन मकबरे में 6 महीने के लिए रखा गया था।
शहजादा औरंगजेब दक्षिण की लड़ाई पर जाने से पहले अपनी मौसी से मिलने आया था और उन दिनों वह इसी बाग में हीराबाई उर्फ जैनाबादी बेगम के चंचल रूप और सौंदर्य का शिकार हो गया था।
ऐसा कहा जाता है महल गुल्हारा से आने वाला पानी स्वास्थ्य के लिए बहुत ही लाभदायक माना जाता था।