भारत की कबीर पंथ की गादी -
बुरहानपुर - यहां पर पूरे भारतवर्ष और नेपाल से कबीर पंथ की दीक्षा लेने के लिए साधक आते हैं।
इस गादी की स्थापना सन 1829 में संत पूरण साहब ने की थी। उनका जन्म 1805 में हुआ है और देवलोक गमन 1837 में हुआ।
इस छोटी सी आयु में उन्होंने बीजक की टीका जिसे त्रिज्या के नाम से जाना जाता है लिखी। इन्होंने शब्दावली के भजनों को और गुरु स्तुति, विनय आदि के पदों की रचना की एवं तत्पश्चात उन्होंने वैराग्य शतक के 1 से 127 तक के दोहे तथा निर्णय सार की रचना की। वस्तुतः त्रिज्या बीजक की पहली टिका थी। उनके बाद संत हंसा साहब ने कार्यभार संभाला। इन दोनों महानुभाव की समाधिया नागझिरी, बुरहानपुर के इसी परिसर में विद्यमान है। इनके पश्चात आज तक समय अनुसार 9 आचार्य हो गए हैं इन की शाखाएं मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, तेलंगाना आदि प्रदेशों में है।
प्रतिवर्ष अगन कृष्ण तृतीया को सद्गुरु श्री पूरण साहब का तिथि महोत्सव मनाया जाता है, उस समय यहां पूरे भारत से हजारों श्रद्धालु, भक्त, संत भाग लेते हैं। संत पूरण साहब की त्रिज्या टीका, वैराग्य शतक और निर्णय सार का प्रकाशन एवं अन्य साहित्यिक रचनाओं का जिसमें बीजक, पंच ग्रंथि, छठ ग्रंथि, पारख सिद्धांत आदि के ऊपर पुस्तके व विभिन्न प्रकार के प्रकाशन (रिसर्च पेपर) प्रस्तुत होते हैं।
यहां पर आचार्य गण व साधक गले में कंठी धारण कर सफेद वस्त्र पहने अध्ययन व अध्यापन में लगे रहते हैं। आडंबर का नामोनिशान आपको देखने को नहीं मिलेगा।
108 कमरों से सुसज्जीत इस आध्यात्मिक महाविद्यालय में दिक्षा प्राप्त करने आये हुए साधकों को निःशुल्क आवास एवं भोजन की व्यवस्था प्रदान की जाती है। न तो संस्थान कोई एड़ देता है और न ही चंदा मांगते है। स्वयमेव संज्ञान से धनराशी प्राप्त होती है।
*कबीरा खड़ा बाजार में,*
*मांगे सबकी खैर*
*ना कोऊ से दोस्ती,*
*ना कोऊ से बैर।।*
