बुरहानपुर की शान “दराबा”: मुगल दरबार से बालाजी के भोग तक, 400 साल पुरानी मिठास की अनोखी कहानी


बुरहानपुर यूं तो अपने समृद्ध इतिहास और पर्यटन स्थलों के लिए प्रसिद्ध है, लेकिन यहां की कुछ पारंपरिक मिठाइयां ऐसी हैं जिनकी पहचान देश-विदेश तक है। इन्हीं में से एक है – दराबा, जो सदियों से इस शहर की मिठास और विरासत को संजोए हुए है।

क्यों पड़ा नाम “दराबा”?

जिला पर्यटन समिति सदस्य डॉ मनोज अग्रवाल के अनुसार, यह मिठाई मुगलकाल में शाही दस्तरखान की शान हुआ करती थी। जब मुगल साम्राज्य के दरबार में इसे विशेष रूप से परोसा जाने लगा, तब इसे “दरबार” से जोड़ते हुए “दराबा” कहा जाने लगा। समय के साथ नाम प्रचलित हुआ और आज यह बुरहानपुर की पहचान बन चुका है।

400 साल पुरानी परंपरा

करीब 400 वर्ष पुराने इस ऐतिहासिक शहर के साथ-साथ दराबा का इतिहास भी उतना ही पुराना माना जाता है। खास बात यह है कि यह मिठाई लगभग विशेष रूप से बुरहानपुर में ही बनाई जाती है, जिससे इसकी स्थानीय विशिष्टता और बढ़ जाती है।

बालाजी को लगता है भोग

डॉ अग्रवाल ने बताया कि नवरात्रि के दौरान दराबा की मांग चरम पर पहुंच जाती है। श्रद्धालु इसे बालाजी को भोग लगाकर प्रसाद के रूप में वितरित करते हैं। मान्यता है कि दराबा का प्रसाद शुभ और मंगलकारी होता है, इसलिए त्यौहारी सीजन में इसकी बिक्री कई गुना बढ़ जाती है।

क्या है इसकी खासियत?

दराबा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह लंबे समय तक ताज़ा और स्वादिष्ट बना रहता है। इसे बनाने में रवा, मैदा, शक्कर और घी जैसी सामान्य सामग्री का उपयोग होता है, लेकिन बनाने की पारंपरिक विधि इसे खास बना देती है।

मिश्रण तैयार करने के बाद उसे कढ़ाई में पकाया जाता है, फिर बाहर निकालकर हाथों से रगड़ा जाता है, जिससे इसका विशिष्ट टेक्सचर तैयार होता है।

पर्यटकों की पहली पसंद

बुरहानपुर आने वाले पर्यटक दराबा का स्वाद लेना नहीं भूलते। देशभर के साथ-साथ विदेशी पर्यटक भी इस पारंपरिक मिठाई को पसंद करते हैं। बाजार में इसकी कीमत लगभग 500 से 600 रुपये प्रति किलो है, जो इसके स्वाद और गुणवत्ता के हिसाब से किफायती मानी जाती है।

डॉ अग्रवाल कहते हैं कि दराबा केवल एक मिठाई नहीं, बल्कि बुरहानपुर की सांस्कृतिक विरासत का मीठा प्रतीक है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी अपनी परंपरा को आगे बढ़ा रहा है।





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