भारतीय इतिहास में वीरता और ऐतिहासिक धरोहरों की भव्यता से भरा हर क़िला अपनी खास जगह रखता है। इनमें से एक ऐतिहासिक स्थल है-असीरगढ़ क़िला, जो मध्य प्रदेश में बुरहानपुर से करीब चौदह मील दूर पर स्थित है।
विशाल दिवारों से घिरा हुआ यह क़िला भारतीय इतिहास की रोमांचक घटनाओं का साक्षी है। इस क़िले के अंदर एक मस्जिद, भगवान शिव मंदिर और एक महल है। यह क़िला तीन भागों में विकसित किया गया है और प्रत्येक भाग का अपना नाम है। पहले भाग को 'असिर्गगढ़' कहा जाता है, दूसरे भाग को 'कमगरगढ़' और तीसरा भाग 'मलयगढ़' कहलाता है ।
मुग़ल काल में, ख़ासकर अकबर के ज़माने में ये क़िला भारत को दो भागो में बांटता था। असीरगढ़ से दिल्ली तक हिंदुस्तान और असीरगढ़ से नीचे पूरा दक्कन। तब अगर उत्तर से दक्कन की ओर जाना हो तो असीरगढ़ के क़िले को पार करना ज़रूरी था, इसलिए इसे दक्कन की चाबी भी कहा जाता था।
इस क़िले की एक रोमांचक बात यह है कि जिसने भी इस क़िले को जीतना चाहा, उसे सिर्फ़ हार ही मिली। यह कहा गया कि जितने भी शासकों ने क़िले पर शासन किया, सबने इसे छल-कपट से अपने कब्ज़े में किया था। भारत में ब्रिटिश हुकूमत के समय क़िला अंग्रेजों के हाथों में आ गया। उससे पहले मुगलों ने भी क़िले पर शासन किया था।
दक्कन का रास्ता खानदेश से होकर जाता था। खानदेश यानी वर्तमान महाराष्ट्र में धुले और जलगांव ज़िला। बुरहानपुर खानदेश के अंतर्गत आता था। बुरहानपुर से कुछ मील की दूरी पर था असीरगढ़ का क़िला। खानदेश के सभी राजाओं ने ये सुनिश्चित किया था कि असीरगढ़ का क़िला अभेद्य रहे। वहां औषधियों, क़ीमती शराब, जड़ी बूटियों का बड़ा भंडार था। वर्षा जल इकट्ठा करने के लिए जलाशय बने हुए थे। लगभग एक शहर के बराबर लोग एक बार में अंदर रह सकते थे। मुग़ल इतिहासकारों के अनुसार जब तक कोई व्यक्ति असीरगढ़ के क़िले को खुद ना देख ले उसे यक़ीन नहीं होगा कि यह कितना भव्य था।
असीरगढ़ ने संघर्ष और विजय की कई गाथाएँ देखी है। इसकी नींव गुप्तवंशी राजा आसा अहिर द्वारा 11वीं सदी में रखी गई थी। इस शक्तिशाली क़िले की चरम सजगता और भव्यता के कारण, मुगल सम्राट अकबर ने 16वीं सदी में इसे अपने अधीन किया और उसे अपनी राजधानी के रूप में नामित किया।
जिस समय अकबर का शासन एक बड़े भाग पर था, अकबर ने इस क़िले को अपने कब्जे में करने का सोचा। जिसकी जानकारी बहादुरशाह फारूखी को लग गयी। उस समय असीरगढ़ क़िला बहादुरशाह फारुख़ी के आधिपत्य में ही था। अकबर द्वारा क़िले पर कब्ज़ा करने की बात सुनकर उसने क़िले की सुरक्षा बढ़ा दी और क़िले में दस साल तक खाने की वस्तुओं का भी इंतज़ाम कर लिया। मुग़लों की तरफ़ से फिर शेख़ फ़रीद बुख़ारी को भेजा गया। बुख़ारी ने क़िले की खबर दी तो 8 अप्रैल 1600 को अकबर खुद बुरहानपुर पहुँच गए। असीरगढ़ के क़िले को चारों तरफ़ से घेर लिया गया।
जनवरी 1600 के अंतिम दिनों से शुरू हुई घेराबंदी दिसंबर 1600 तक चलती रही । सेना घेराबंदी किए बैठी रही। ना कोई बाहर आया ना कोई अंदर जा पाया। इस दौरान लगातार तोपें दागी गई। लेकिन क़िले को कोई असर ना हुआ। ऐसे में एक मुग़ल जनरल ने एक तरीका निकला कि एक छोटी सी सुरंग बनाकर, विस्फोट से क़िले को उड़ा दिया जाए। बहुत बड़ी मात्रा में बारूद से सुरंग में विस्फोट किया गया। लेकिन यह तरीका भी क़िले को भेदने में कारगर नहीं रहा।
क़िले की दीवार इतनी मजबूत थी कि किसी भी हमले से वह नहीं गिरी। जब अकबर द्वारा किये गए हमलों से भी कुछ नहीं हुआ तो उसने कूटनीति बनाई और बहादुरशाह फारुख़ी को पत्र लिखकर यह आश्वासन दिलाया कि वह उससे शांति पूर्ण बातचीत करना चाहते हैं। पत्र पर विश्वास करके बहादुरशाह क़िले से बाहर निकल आए। अकबर से बातचीत के दौरान किसी ने उन पर पीछे से हमला कर दिया और उसे बंदी बना लिया। 17 जनवरी 1601 ईसवीं में अकबर ने आखिर क़िले पर अपना कब्ज़ा कर लिया।
असीरगढ़ के क़िले से जुड़ा एक रहस्यात्मक किस्सा भी है जिसका वैसे तो कोई पुख्ता प्रमाण नहीं है परंतु स्थानीय लोग इसे मानते हैं। यह किस्सा अश्वत्थामा से संबंधित है। स्थानीय लोगों के अनुसार गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा, जिन्हें अमरता का वरदान मिला था, असीरगढ़ क़िले के पास एक शिव मंदिर में रोज़ पूजा करने आते हैं, इसलिए यहां हर सुबह शिवलिंग पर फूल चढ़े मिलते हैं। वैसे तो इसे प्रमाणित करने के लिए कोई दस्तावेज या अन्य तथ्य नहीं है परंतु आइन-ए-अकबरी में असीरगढ़ क़िले के बारे में दर्ज है- "पहले ये इलाक़ा पूरी तरह से वीरान था। सिर्फ़ चंद लोग यहां रहते थे। ये इनकी पूजा की जगह हुआ करती थी। और इसका नाम अश्वत्थामा था।"
सतपुड़ा पहाड़ियों पर स्थित यह क़िला आज भी अपने गौरवशाली अतीत को समेटे खड़ा है। पर्यटन का महत्वपूर्ण केंद्र होने के साथ ही यह क़िला भारत के पुरातन शौर्य, पराक्रम और निर्माण कौशल की गवाही देता है।
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