उनका पूरा बचपन ताजनगरी में ही बीता। जवानी के दहलीज पर कदम रखते ही वह दिल्ली चले गए। यहां जाने के बाद भी ताउम्र मिर्जा गालिब के दिल व दिमाग में आगरा छाया रहा।
मशहूर शायर मिर्जा गालिब का पूरा नाम असदुल्लाह खां गालिब था। वह कला महल (बाद में जो काला महल हुआ) स्थित अपनी ननिहाल की हवेली में पैदा हुए, जहां इस वक्त इंद्रभान गर्ल्स इंटर कॉलेज है।
पिता का नाम अब्दुल्ला बेग था। आगरा के उस्तादों से मिर्जा गालिब ने तालीम हासिल की। वह 11 वर्ष की उम्र से शेर कहने लगे थे। दिल्ली जाने के बाद भी गालिब का दिल आगरा के लिए ही तड़पता रहा।
उन्होंने अपनी जिंदगी आगरा दिल्ली और कलकत्ता में गुजारी. गालिब ने अपने बारे में लिखा है कि दुनिया में यूं तो बहुत से अच्छे शायर हैं, लेकिन उनका अंदाज सबसे निराला है.
1850 में शहंशाह बहादुर शाह ज़फ़र द्वितीय ने मिर्ज़ा ग़ालिब को दबीर-उल-मुल्क और नज़्म-उद-दौला के ख़िताब से नवाज़ा.
गालिब एक समय में मुग़ल दरबार के शाही इतिहासकार भी थे.
गालिब ने 15 फरवरी 1869 को वफात पाई.
शराब के शौकीन थे मिर्जा गालिब
मिर्जा गालिब को शराब पीने और जुऐ का बहुत शौक था. गालिब महंगी और अंग्रेजी शराब पीने के शौकीन थे. वह शराब लिए कुछ भी कर सकते थे. कहते हैं शौक इसांन से कुछ भी करवा सकती है. भले ही उनका पास पैसों की कितनी भी दिक्कत हो,लेकिन वो कहीं न कहीं शराब खरीद ही लेते थे. चाहे सैकड़ों किलोमीटर दूर जाकर भी शराब लानी पड़े, तो वो पैदल चलकर भी शराब लेकर ही आते थे. उन्होंने अपनी शायरी में भी बुरी आदतों का जिक्र किया है.
'ग़ालिब छुटी शराब पर अब भी कभी-कभी
पीता हूँ रोज़-ए-अब्र ओ शब-ए-माहताब में'
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