भूमि का दोहन करें, शोषण नहीं-पूर्व मंत्री श्रीमती अर्चना चिटनिस,ग्राम धामनगांव में मां वाघेश्वरी देवी मंदिर परिसर में उपस्थितजनों ने संकल्पित होकर माँ वसुंधरा को किया सुपोषित

बुरहानपुर - चैत्र शुक्ल १, वर्ष प्रतिपदा 13 अप्रैल 2021 से अखात्रिज 14 मई 2021 भूमि सुपोषण अभियान अतर्गत में सक्रीयता से ‘माता भूमि‘ पुत्रो अहं पृथिव्याः। (अथर्ववेद) को साकार किया जा रहा है। समस्त राष्ट्र में भूमि की उर्वरक शक्ति बढ़ाने हेतु भूमि सुपोषण अभियान का शुभारंभ मध्यप्रदेश की पूर्व कैबिनेट मंत्री श्रीमती अर्चना चिटनिस (दीदी) के मार्गदर्शन में बुरहानपुर के ग्राम धामनगांव में माँ वाघेश्वरी देवी मंदिर पर जनप्रतिनिधियों, कृषकों एवं ग्रामीणजन ने संकल्पित होकर माँ वसुंधरा को सुपोषित किया। उपस्थितजनों ने मां वाघेष्वरी देवी की महाआरती की तथा पूजा, अर्चना एवं हवन किया। 
ज्ञात हो कि 13 अप्रैल से भूमि सुपोषण एवं संरक्षण हेतु राष्ट्रव्यापी जन अभियान, 33 संस्थाओं द्वारा 14 मई 2021 तक विशेष अभियान चलाया जा रहा है। इस राष्ट्र उत्थान के अभियान में बुरहानपुर भी सहभागी बन रहा है।
श्रीमती चिटनिस ने उपस्थितजनों एवं क्षेत्र के नागरिकों को सोशल मीडिया के माध्यम से संबोधित करते हुए कहा कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा 13 अप्रैल से प्रारम्भ हुए भूमि सुपोषण अभियान से जुड़े और प्रकृति रक्षण की दिशा में कदम उठाएं। देश के सभी गांवों में खेत की मिट्टी का पूजन, गौ माता का पूजन, जैविक कृषि, गौ आधारित कृषि, भूमि की उर्वरा शक्ति को बढ़ावा देने का संकल्प लें। भूमि का दोहन करें, शोषण नहीं।
श्रीमती अर्चना चिटनिस ने कहा कि विगत कई सदियों से हम भारतीयों का प्रकृति से बहुत गहरा संबंध रहा है। क्या हमने कभी सोचा है कि पृथ्वी हमारी माता है। यदि नहीं तो यही समय है, जब हमें अपने विचारों में अमूल्य बदलाव की आवष्यकता है। अथर्ववेद के भूमि सुक्त में वर्णित किया गया है। एक पुत्र के भांति ही हमें भी हमारी धरती माता की सेवा करनी चाहिए और हमारी नैतिक जिम्मेदारी भी है। तो आईये भूमि सुपोषण एवं संरक्षण के इस प्रयास में शाष्वत विकास के लिए राष्ट्रीय अभियान का हिस्सा बने। श्रीमती चिटनिस ने कहा कि हर सिक्के के दो पहलू होते है। रासायनिक खाद और कीटनाषकों के माध्यम से कृषि करने के बारे में भी यही तथ्य है। पहले तो उत्पादन में वृद्धि हुई, लेकिन स्वास्थ्य और पर्यावरण पर इसके गंभीर परिणाम हुए। धीरे-धीरे कृषि उत्पादकता घटने लगी। कृषि से संबंधित स्थायी संसदीय समिति की 29वीं रिपोर्ट के अनुसार 1960-70 में जो वृद्धि दर 8 प्रतिशत थी। वह 2000-2010 में घटकर 2.61 प्रतिशत रह गई।

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