क्रांतिवीर अमर शहीद हेमू कालाणी के बलिदान दिवस पर विशेष...भारत माता के सच्चे सपूत थें अमर शहीद हेमू कालानी- श्री मंगवानी

खंडवा। देश की आजादी के आन्दोलन में क्रांतिवीर अमर शहीद हेमू कालानी समाज के लिये एक प्रेरणा स्रोत हैं। वीर हेमू कालानी के बलिदान दिवस की पूरी संध्या पर सिंधी समाज की भूमिका तथा अन्य बलिदानियों के जीवन पर प्रकाश डालते हुए उक्त बात राष्ट्रीय सिंधी समाज प्रदेश प्रवक्ता“निर्मल मंगवानी” ने कहीं। शहीद  के जीवन पर  विस्तार से  प्रकाश डालते हुए श्री मंगवानी ने कहा कि समाज की आने वाली पीढ़ी इस सच्चे सपूत के जीवन से प्रेरणा ले सके और अपने देश, धर्म, समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन कर सके। भारत सरकार ने वीर बालक हेमू के बलिदान पर डाक टिकट भी जारी किया हैं। अमर शहीद हेमू कालाणी का जन्म 23 मार्च सन् 1923 को सिन्ध के सख्खर में हुआ था। उनके पिताजी का नाम “पेसूमल” कालाणी एवं उनकी माँ का नाम “जेठी बाई” था। सन् 1942 में जब महात्मा गांधी ने भारत छोड़ो आन्दोलन चलाया तो वीर बालक हेमू भी उसमें जुड़ गये। अक्टूबर 1942 में हेमू को पता चला कि अंग्रेज सेना की एक टुकडी तथा हथियारों से भरी ट्रेन उसके नगर से गुजरेगी, तब उसने अपने साथियों के साथ इस ट्रेन को रोकने की सोची। उसने रेल की पटरियों की फिशप्लेट निकालकर पटरी उखाडने तथा ट्रेन को रोकने का प्लान तैयार किया। हेमू और उनके दोस्तों के पास पटरियों के नट बोल्ट खोलने के लिए कोई औजार नहीं थे, अत: लोहे की छडों से पटरियों को हटाने लगे, जिससे बहुत आवाज होने लगी। जिससे हेमू और उनके दोस्तों को पकडने के लिए अंग्रेज सेना का एक दस्ता तेजी से दौडा। हेमू ने अपने सब दोस्तो को भगा दिया, किन्तु खुद नहीं भगा और पकडा गया, पकड़े जाने के बाद हेमू को अंग्रेजी शासन ने जेल में डाल दिया और उसके उसके मित्रों के नाम पूछे, लेकिन वीर हेमू ने उनके नाम नहीं बताये। हेमू कालाणी को कोर्ट ने फांसी की सजा सुनाई। उस समय के सिंध के गणमान्य लोगों ने एक पेटीशन दायर की और वायसराय से उनको फांसी की सजा ना देने की अपील की। वायसराय ने इस शर्त पर यह स्वीकार किया कि हेमू कालाणी अपने साथियों का नाम और पता बताये पर हेमू कालाणी ने यह शर्त अस्वीकार कर दी। उनकी देशभक्ति का इनाम 21 जनवरी 1943 को उन्हें फांसी की सजा के रूप में मिला। जब फांसी से पहले उनसे आखरी इच्छा पूछी गई तो उन्होंने भारतवर्ष में फिर से जन्म लेने की इच्छा जाहिर की। 19 साल की अल्पायु में मां भारती के इस अमर सपूत ने सहर्ष फांसी के फंदे को गले लगाकर राष्ट्रभक्ति की अविस्मरणीय भक्ति की मिसाल प्रस्तुत की।

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