गुरु तेग़बहादुर सिंह.
सिक्खों के नौवें गुरु, जिनका विश्व के इतिहास में धर्म एवं सिद्धांतों की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देने वालों में इनका अद्वितीय स्थान है. तेग़ बहादुर जी के बलिदान से हिंदुओं व हिन्दू धर्म की रक्षा हुई.
प्रकाश पर्व - 18 अप्रैल सन 1621 ई. अमृतसर, तत्कालीन अविभाजित पंजाब.
बलिदान पर्व - 24 नवम्बर सन 1675 ई. चांदनी चौक, दिल्ली.
नानकशाही कैलेंडर - 16 दिसंबर.
गुरु तेग़ बहादुर का जन्म पंजाब के अमृतसर नगर में हुआ था. ये गुरु हरगोविन्द जी के पाँचवें पुत्र थे. आठवें गुरु इनके पोते 'हरिकृष्ण राय' जी की अकाल मृत्यु हो जाने के कारण जनमत द्वारा ये नवम गुरु बनाए गए. इन्होंने आनन्दपुर साहिब का निर्माण कराया और ये वहीं रहने लगे थे।
उनका बचपन का नाम त्यागमल था, मात्र 14 वर्ष की आयु में अपने पिता के साथ मुग़लों के हमले के ख़िलाफ़ हुए युद्ध में उन्होंने वीरता का परिचय दिया, उनकी वीरता से प्रभावित होकर उनके पिता ने उनका नाम त्यागमल से तेग़ बहादुर यानि तलवार के धनी रख दिया. गुरु जी ने धर्म के प्रसार लिए कई स्थानों का भ्रमण किया. कुरुक्षेत्र से यमुना के किनारे होते हुए कड़ामानकपुर पहुँचे और यहीं पर उन्होंने साधु भाई मलूकदास का उद्धार किया. इन्हीं यात्राओं में सन 1666 में गुरुजी के यहाँ पटना साहब में पुत्र का जन्म हुआ. जो दसवें गुरु गुरु गोविंद सिंह बने. गुरु तेग़ बहादुर जी सिखों के नौवें गुरु माने जाते हैं. औरंगज़ेब के शासन काल की बात है, औरंगज़ेब के दरबार में एक विद्वान पंडित आकर रोज़ गीता के श्लोक पढ़ता और उसका अर्थ सुनाता था, पर वह पंडित गीता में से कुछ श्लोक छोड़ दिया करता था, एक दिन पंडित बीमार हो गया और औरंगज़ेब को गीता सुनाने के लिए उसने अपने बेटे को भेज दिया परन्तु उसे बताना भूल गया कि उसे किन किन श्लोकों का अर्थ राजा से सामने नहीं करना था, पंडित के बेटे ने जाकर औरंगज़ेब को पूरी गीता का अर्थ सुना दिया. गीता का पूरा अर्थ सुनकर औरंगज़ेब को यह ज्ञान हो गया कि प्रत्येक धर्म अपने आपमें महान है किन्तु औरंगजेब की हठधर्मिता थी कि वह अपने के धर्म के अतिरिक्त किसी दूसरे धर्म की प्रशंसा सहन नहीं थी. औरंगज़ेब ने सबको इस्लाम धर्म अपनाने का आदेश दे दिया और संबंधित अधिकारी को यह कार्य सौंप दिया. औरंगज़ेब ने कहा - "सबसे कह दो या तो इस्लाम धर्म कबूल करें या मौत को गले लगा लें."
इस प्रकार की ज़बर्दस्ती शुरू हो जाने से अन्य धर्म के लोगों का जीवन कठिन हो गया. जुल्म से ग्रस्त कश्मीर के पंडित गुरु तेग़ बहादुर के पास आए और उन्हें बताया कि किस प्रकार इस्लाम स्वीकार करने के लिए अत्याचार किया जा रहा है, यातनाएँ दी जा रही हैं, हमें मारा जा रहा है, कृपया आप हमारे धर्म को बचाइए. गुरु तेग़ बहादुर जब लोगों की व्यथा सुन रहे थे, उनके 9 वर्षीय पुत्र बाल प्रीतम गोविंदसिंह वहाँ आए और उन्होंने पिताजी से पूछा - "पिताजी, ये सब इतने उदास क्यों हैं, आप क्या सोच रहे हैं."
गुरु तेग़ बहादुर ने कश्मीरी पंडितों की सारी समस्याएं बाल प्रीतम को बताईं तो उन्होंने पूछा - "इसका हल कैसे होगा." गुरु साहिब ने कहा - "इसके लिए बलिदान देना होगा." बाल प्रीतम ने कहा - "आपसे महान पुरुष कोई नहीं है, बलिदान देकर आप इन सबके धर्म को बचाइए." उस बच्चे की बातें सुनकर वहाँ उपस्थित लोगों ने पूछा -
"यदि आपके पिता बलिदान देंगे तो आप यतीम हो जाएँगे, आपकी माँ विधवा हो जाएगीं."
बाल प्रीतम ने उत्तर दिया - "यदि मेरे अकेले के यतीम होने से लाखों बच्चे यतीम होने से बच सकते हैं या अकेले मेरी माता के विधवा होने जाने से लाखों माताएँ विधवा होने से बच सकती है तो मुझे यह स्वीकार है."
तत्पश्चात गुरु तेग़ बहादुर जी ने पंडितों से कहा कि आप जाकर औरंगज़ेब से कह दें कि यदि गुरु तेग़ बहादुर ने इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया तो उनके बाद हम भी इस्लाम धर्म ग्रहण कर लेंगे और यदि आप गुरु तेग़ बहादुर से इस्लाम धारण नहीं करवा पाए तो हम भी इस्लाम धर्म धारण नहीं करेंगे, औरंगज़ेब ने यह स्वीकार कर लिया. गुरु तेग़ बहादुर दिल्ली में औरंगज़ेब के दरबार में स्वयं गए, औरंगज़ेब ने उन्हें बहुत से लालच दिए, पर गुरु तेग़ बहादुर जी नहीं माने तो उन पर ज़ुल्म किए गये, उन्हें कैद कर लिया गया, दो शिष्यों को मारकर गुरु तेग़ बहादुर जी को ड़राने की कोशिश की गयी, पर वे नहीं माने. उन्होंने औरंगजेब से कहा -
"यदि तुम ज़बर्दस्ती लोगों से इस्लाम धर्म ग्रहण करवाओगे तो तुम सच्चे मुसलमान नहीं हो क्योंकि इस्लाम धर्म यह शिक्षा नहीं देता कि किसी पर जुल्म करके मुस्लिम बनाया जाए."
औरंगजेब यह सुनकर आगबबूला हो गया, उसने दिल्ली के चाँदनी चौक पर गुरु तेग़ बहादुर जी का शीश काटने का हुक्म ज़ारी कर दिया और गुरु जी ने 24 नवम्बर सन 1675 को हँसते-हँसते बलिदान दे दिया. गुरु तेग़ बहादुर की याद में उनके शहीदी स्थल पर जो गुरुद्वारा बना है, जिस का नाम गुरुद्वारा शीश गंज साहिब है.
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