बुरहानपुर - जिले की बढ़ती आबादी और नई कॉलोनियों,निजी व शासकीय निर्माण कार्यों की वजह से ईंट भट्टों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है। बुरहानपुर क्षेत्र में कई ईंट भट्टे आबादी वाले इलाकों के नज़दीक संचालित हो रहे हैं, जिससे न केवल पर्यावरण को नुकसान हो रहा है बल्कि लोगों के स्वास्थ्य पर भी गंभीर प्रभाव पड़ रहा है।
बुरहानपुर में लोधीपुरा,इतवारा गेट के पास, महाजना पेठ,जैनाबाद,रेणुका माता मंदिर रोड आदि के रहवासी क्षेत्रों में ईंट भट्ठे संचालित हैं।
इस समस्या पर पर्यावरणविद डॉ मनोज अग्रवाल ने बताया कि ईंट भट्टों में कोयला, लकड़ी, पेट्रोलियम उत्पाद और कभी-कभी कचरा जलाकर ईंटें पकाई जाती हैं। इस प्रक्रिया से भारी मात्रा में धुआं, कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रस ऑक्साइड और अन्य हानिकारक गैसें निकलती हैं। यह धुआं हवा में घुलकर वायुमंडल को प्रदूषित करती है और आसपास रहने वाले लोगों के लिए सांस संबंधी बीमारियों, फेफड़ों के संक्रमण,दमा आदि का कारण बनती है।
सल्फर और अन्य रसायनों के कारण आंखों में जलन, बाल उड़ना,त्वचा की समस्या होती है।
वायु में घुले इस प्रदूषण से रक्तचाप और हृदय संबंधी बीमारियां बढ़ सकती हैं।
कमजोर इम्यून सिस्टम वाले लोगों, विशेष रूप से बच्चों और बुजुर्गों पर इसका असर ज्यादा होता है।
इसी के साथ ही ईंट भट्टों से निकलने वाला धुआं हवा को दूषित करता है
इस समस्या समाधान हेतु डॉ अग्रवाल ने सुझाव दिए कि प्रशासन को चाहिए कि ईंट भट्टों के लिए आबादी से दूर विशेष क्षेत्र निर्धारित करे।
ईंटों को पकाने के लिए लकड़ी और कोयले के बजाय पर्यावरण-अनुकूल ईंधन जैसे बायोगैस और कृषि अवशेषों का उपयोग किया जाए।
ईंट निर्माण में आधुनिक तकनीकों जैसे हॉफमैन किल्न या ज़िगज़ैग तकनीक का उपयोग किया जाए, जिससे धुएं का उत्सर्जन कम हो।
प्रशासन को सख्त नियम बनाकर प्रदूषण फैलाने वाले भट्टों पर कार्रवाई करनी चाहिए और लोगों को जागरूक करना चाहिए।
डॉ मनोज अग्रवाल ने यह भी बताया कि बुरहानपुर जैसे क्षेत्रों में ईंट भट्टों का रिहायशी इलाकों में संचालन स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए गंभीर समस्या बन चुका है। यदि इस मुद्दे पर समय रहते उचित कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में स्थिति और खराब हो सकती है। सरकार, उद्योगों और आम जनता को मिलकर इस समस्या का समाधान निकालना होगा ताकि हम एक स्वस्थ और स्वच्छ पर्यावरण बना सकें।
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